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एक्टर का असली मकसद भारतीय सेना में शामिल होना था, जिसके लिए उन्होंने एनसीसी में शानदार परफॉर्म किया था. उन्होंने ब्रिटेन में ट्रेनिंग भी ली थी, लेकिन उम्र सीमा चलते वह सेना में भर्ती नहीं हो सके. उन्होंने इसके बाद मॉडलिंग और विज्ञापनों का रुख किया. साल 2000 में तमिल फिल्म ‘अलाई पायूथे’ और फिर हिंदी में ‘रहना है तेरे दिल में’ से उन्हें बड़ी पहचान मिली. आज वे एक नेशनल अवॉर्ड विनर एक्टर, लेखक और निर्देशक हैं.

नई दिल्ली: एक्टर अपनी सहज एक्टिंग के लिए मशहूर हैं. वे अपनी अदाकारी से सीधा दर्शकों के दिलों में उतर जाते हैं, पर एक्टिंग उनका पहला प्यार नहीं था. आज भले ही वह एक्टिंग की दुनिया के बड़े स्टार हों, लेकिन बचपन में उन्होंने कभी भी एक्टर बनने का सपना नहीं देखा था. वे भारतीय सेना में भर्ती होना चाहते थे. (फोटो साभार: Instagram@actormaddy)

आर माधवन का इकलौता मकसद भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा करना था. वह देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा रखते थे, मगर किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था. उम्र के एक मामूली से फासले ने उनके इस बड़े सपने को हमेशा के लिए तोड़ दिया और उनकी पूरी जिंदगी की दिशा को एक बिल्कुल नए रास्ते पर मोड़ दिया.(फोटो साभार: Instagram@actormaddy)

आर माधवन का जन्म 1 जून 1970 को जमशेदपुर के एक पढ़े-लिखे तमिल परिवार में हुआ था. उनके पिता टाटा स्टील में मैनेजमेंट एग्जीक्यूटिव थे और मां बैंक ऑफ इंडिया में मैनेजर के पद पर थीं. जमशेदपुर से शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद माधवन ने इलेक्ट्रॉनिक्स में अपनी ग्रेजुएशन डिग्री ली. पढ़ाई के साथ ही उन्हें खेलकूद, डिबेट और एनसीसी में बहुत दिलचस्पी थी. (फोटो साभार: Instagram@actormaddy)
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आर माधवन में कॉलेज के दिनों में सेना में जाने का जुनून इस कदर था कि उन्होंने एनसीसी में कमाल का परफॉर्म किया था. वे महाराष्ट्र के सबसे बेहतरीन कैडेट्स में चुने गए और इसी वजह से उन्हें स्पेशल मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए ब्रिटेन जाने का मौका भी मिला. उन्होंने वहां थलसेना, नौसेना और वायुसेना की कड़ी ट्रेनिंग ली, लेकिन जब सेना में भर्ती होने का वक्त आया, तो उनकी उम्र तय सीमा से महज 6 महीने कम रह गई. (फोटो साभार: Instagram@actormaddy)

माधवन का दिल इस एक झटके ने तोड़ दिया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने सेना का रास्ता बंद होने के बाद लोगों को पर्सनैलिटी डेवलपमेंट और पब्लिक स्पीकिंग सिखाना शुरू कर दिया. उन्हें मॉडलिंग के कुछ प्रोजेक्ट्स मिले और उन्होंने अपना पोर्टफोलियो एक एजेंसी को भेजा, जिसके बाद उन्हें टीवी विज्ञापनों और छोटे-मोटे सीरियल्स में काम मिलने लगा. (फोटो साभार: IMDb)

अभिनय की दुनिया में आर माधवन को असली और बड़ा ब्रेक साल 2000 में मिला, जब डायरेक्टर मणिरत्नम की तमिल फिल्म ‘अलाई पायूथे’ रिलीज हुई. यह फिल्म ब्लॉकबस्टर रही और माधवन रातों-रात साउथ के स्टार बन गए. इसके तुरंत बाद, हिंदी सिनेमा में उनकी एंट्री फिल्म ‘रहना है तेरे दिल में’ से हुई. इस फिल्म के ‘मैडी’ के किरदार ने उन्हें हर युवा के दिल की धड़कन बना दिया. (फोटो साभार: IMDb)

माधवन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और ‘रंग दे बसंती’, ‘3 इडियट्स’, ‘तनु वेड्स मनु’ और ‘विक्रम वेधा’ जैसी एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्में दीं. वे सिर्फ एक बेहतरीन एक्टर ही नहीं, बल्कि एक शानदार लेखक, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर भी बनकर उभरे. महान वैज्ञानिक नंबी नारायणन की बायोपिक ‘रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट’ बनाकर उन्होंने निर्देशन में भी अपना लोहा मनवाया.
(फोटो साभार: IMDb)

माधवन को अपनी इस लाजवाब कला के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड से लेकर कई फिल्मफेयर और स्टेट लेवल के पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. महज 6 महीने की उम्र के अंतर ने भले ही भारत से एक जांबाज सैनिक छीन लिया हो, लेकिन सिनेमा प्रेमियों को एक ऐसा नायाब कलाकार दे दिया, जिसकी कमी कभी कोई पूरी नहीं कर सकता. (फोटो साभार: Instagram@actormaddy)

