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एक्ट्रेस पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन अपनी मां की जिद की वजह से उन्हें अभिनय में आना पड़ा. वह महबूब खान के पास इस उम्मीद के साथ बेमन से स्क्रीन टेस्ट देने गई थीं कि वे उन्हें रिजेक्ट कर देंगे, लेकिन महबूब खान उनके अभिनय से प्रभावित हुए और उन्हें 1943 की फिल्म ‘तकदीर’ के लिए चुन लिया. इसके बाद, वे ‘बरसात’, ‘अंदाज’ जैसी फिल्मों से स्टार बन गईं. एक फिल्म ने उन्हें ग्लोबल स्टार बना दिया. उन्होंने बाद में अपने ऑनस्क्रीन बेटे से शादी की.

नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर की बात हो, तो दिग्गज अभिनेत्री का जिक्र जरूर होता है. उनका नाम जुबां पर आते ही उस बेबस लेकिन हिम्मतवाली ‘राधा’ का चेहरा आंखों के सामने घूम जाता है, जो 50 के दशक में इस किरदार से दुनियाभर में छा गई थी. हम नरगिस और उनकी फिल्म ‘मदर इंडिया’ की बात कर रहे हैं. लेकिन इस हकीकत से बहुत कम लोग वाकिफ हैं कि सिल्वर स्क्रीन पर अपनी अदाकारी का जादू बिखेरने वाली नरगिस कभी एक्ट्रेस बनना ही नहीं चाहती थीं.
(फोटो साभार: AI से जेनरेटेड इमेज)

दरअसल, नरगिस का सपना कोई ग्लैमरस लाइफ जीना नहीं था, बल्कि वह पढ़-लिखकर एक डॉक्टर बनना चाहती थीं ताकि बीमारों का इलाज कर समाज की सेवा कर सकें. मगर उनकी मां जद्दनबाई की जिद के आगे उनकी एक न चली. मां की इच्छा का मान रखने के लिए उन्हें न चाहते हुए भी फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में कदम रखना पड़ा. (फोटो साभार: IMDb)

नरगिस का असली नाम रशीद फातिमा था और उनका जन्म 1 जून 1929 को कोलकाता में हुआ था. उनकी मां जद्दनबाई अपने जमाने की मशहूर गायिका, डांसर, डायरेक्टर और एक्ट्रेस थीं, जिनका फिल्म इंडस्ट्री में काफी दबदबा था. जद्दनबाई अपनी बेटी को भी एक बड़ी स्टार के रूप में देखना चाहती थीं, जबकि नरगिस का पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपनी पढ़ाई पर था.
(फोटो साभार: IMDb)
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साल 1935 में जब नरगिस महज छह साल की थीं, तब उनकी मां ने उन्हें बाल कलाकार के रूप में फिल्म ‘तलाश-ए-हक’ में काम दे दिया. भले ही इस फिल्म से उनके एक्टिंग करियर की शुरुआत हो गई, लेकिन उनका मन इस काम में रत्ती भर भी नहीं लगता था. वह लगातार फिल्मों से दूरी बनाने और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बहाने ढूंढती रहती थीं. (फोटो साभार: IMDb)

जद्दनबाई ने एक दिन नरगिस को उस दौर के दिग्गज डायरेक्टर महबूब खान के पास स्क्रीन टेस्ट देने के लिए भेज दिया. नरगिस इस टेस्ट के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थीं और बेहद बेमन से वहां गईं. उनके दिमाग में एक ही प्लान था कि वह वहां इतना खराब ऑडिशन देंगी कि महबूब खान उन्हें तुरंत रिजेक्ट कर दें, ताकि वह वापस अपनी डॉक्टर की पढ़ाई पर फोकस कर सकें. (फोटो साभार: IMDb)

मगर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था, नरगिस का यह दांव उल्टा पड़ गया. महबूब खान उनकी सहज एक्टिंग और चेहरे के हाव-भाव से इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत अपनी फिल्म ‘तकदीर’ (1943) के लिए उन्हें बतौर लीड एक्ट्रेस साइन कर लिया. इसके बाद 1949 में आई राज कपूर की फिल्म ‘बरसात’ और दिलीप कुमार के साथ फिल्म ‘अंदाज’ ने उन्हें रातों-रात सुपरस्टार बना दिया. (फोटो साभार: IMDb)

करियर की ऊंचाइयों पर पहुंचते हुए साल 1957 में नरगिस की जिंदगी में डायरेक्टर महबूब खान दोबारा एक वरदान बनकर आए और उन्हें फिल्म ‘मदर इंडिया’ ऑफर की. इस फिल्म में ‘राधा’ के किरदार को नरगिस ने इतनी शिद्दत से जिया कि इस फिल्म को ऑस्कर में भारत की तरफ से ऑफिशियल नॉमिनेशन मिला. इस ऐतिहासिक फिल्म ने नरगिस को दुनिया भर में अमर कर दिया. (फोटो साभार: IMDb)

सिल्वर स्क्रीन पर राज कपूर के साथ नरगिस की केमिस्ट्री को दर्शकों ने ‘आवारा’, ‘श्री 420’ और ‘चोरी चोरी’ जैसी फिल्मों में खूब सराहा. उन्होंने आगे चलकर अभिनेता सुनील दत्त से शादी की और फिल्मों से दूरी बना ली. भले ही नरगिस कभी डॉक्टर नहीं बन पाईं, लेकिन बाद के दिनों में उन्होंने राजनीति और समाज सेवा के जरिए लोगों की मदद करने का अपना पुराना सपना जरूर पूरा किया. (फोटो साभार: IMDb)

