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बॉलीवुड में कुछ फिल्में ऐसी बनाई गई हैं जिनकी कहानी अपने समय से आगे की थी. इन फिल्मों की कहानी से इंस्पायर होकर बॉलीवुड के कई निर्माता-निर्देशकों ने दूसरी फिल्में बनाईं. ऐसी ही एक फिल्म 1971 में आई थी जिसका दो बार रीमेक भी बनाया गया. कहानी में थोड़ा बहुत बदलाव करके दो फिल्में और इसी से मिलती-जुलती बनाई गईं. दोनों ही फिल्में ब्लॉकबस्टर साबित हुई. एक मूवी के नाम तो वर्ल्ड रिकॉर्ड भी है. दोनों फिल्मों में विलेन का नाम पर्दे पर छा गया. एक फिल्म ने तो हिंदी सिनेमा को हमेशा के लिए बदल दिया. ये फिल्में कौन सी हैं, जिनकी कहानी सेम-सेम थी.

बॉलीवुड में सुपरहिट फिल्मों से मिलते-जुलती कहानी पर मूवी बनाई जाती रही हैं. राज खोसला सस्पेंस, एक्शन, थ्रिल और सामाजिक फिल्में बनाने के लिए जाने जाते थे. 1971 में उन्होंने एक ऐसी फिल्म रुपहले पर्दे पर आई थी जिसका बेसिक आइडिया चुराकर दो और फिल्में बनाई गईं. दोनों फिल्मों ने इतिहास रच दिया. एक मूवी को हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म माना जाता है. हम बात कर रहे हैं 13 अगस्त 1971 को रिलीज हुई ‘मेरा गांव मेरा देश’ था’ जिसकी कहानी अख्तर रोमानी ने लिखी थी. स्क्रीनप्ले जीआर कामत ने लिखा था. फिल्म को राज खोसला के भाई लेखराज खोसला और बोलू खोसला ने प्रोड्यूस किया था. इस फिल्म की स्टोरी को आधार बनाकर दो और फिल्में बनाई गईं और दोनों ही फिल्में ब्लॉकबस्टर रहीं.

‘मेरा गांव मेरा देश’ में धर्मेंद्र, आशा पारेख और विनोद खन्ना लीड रोल में थे. विनोद खन्ना निगेटिव रोल में थे, फिर भी उनकी किस्मत बदल गई. उनकी स्क्रीन प्रजेंस बहुत डोमिनेटिंग थी. फिर वो हीरो बन गए. फिर इतने बड़े सुपरस्टार बने कि अमिताभ बच्चन के स्टारडम को चुनौती दी. कई फिल्मों में अमिताभ से ज्यादा पैसा लिया. ‘मेरा गांव मेरा देश’ जब आई तब डकैतों की कहानियां गांव-समाज में रोमांच पैदा कर देती थीं. ऐसी ही कहानियों को आधार बनाकर ‘मेरा गांव मेरा देश’ बनाई गई थी जिसका म्यूजिक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने कंपोज किया था.

फिल्म के गाने ‘आया आया अटरिया पे कोई चोर’, ‘कुछ कहता है ये सावन’, ‘मार दिया की छोड़ दिया जाए’ और ‘अपनी प्रेम कहानियां’ की मिठास और आकर्षण आज भी बरकरार है. सभी गाने गीतकार आनंद बख्शी की कलम से निकले थे. सबसे दिलचस्प बात यह है कि ‘मेरा गांव मेरा देश’ फिल्म ने ‘शोले’ और ‘कर्मा’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों की बुनियाद रखी. तीनों फिल्मों का प्लॉट एक जैसा ही है. तीनों फिल्मों में कई समानताएं हैं.
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सबसे पहले बात करते हैं ‘शोले’ की. सलीम-जावेद की जोड़ी ने ‘मेरा गांव मेरा देश’ की कहानी को नए अंदाज में ‘शोले’ में पेश करके तहलका मचा दिया था. ‘शोले’ और ‘मेरा गांव मेरा देश’ में कई समानताएं है. आइकॉनिक फिल्म ‘शोले’ में धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, संजीव कुमार, एके हंगल, अमजद खान लीड रोल में थे. फिल्म 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई थी. पूरे तीन दिन तक फिल्म को कोई रिस्पांस नहीं मिला. फिल्म के क्लाइमैक्स को फिर से शूट किए जाने की तैयारी कर ली गई थी. जावेद अख्तर-रमेश सिप्पी और अमिताभ बच्चन के बीच मीटिंग भी हुई थी. फिर तय हुआ कि सोमवार का इंतजार कर लिया जाए. फिर जो हुआ, वो इतिहास है.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि शोले में अमजद खान ने ‘गब्बर सिंह’ डाकू का रोल किया था. ‘मेरा गांव मेरा देश’ में विनोद खन्ना का नाम जब्बर सिंह रहता है, वही शोले फिल्म में अमजद खान का नाम ‘गब्बर सिंह’ रहता है. अमजद खान के पिता जयंत ने ‘मेरा गांव मेरा देश’ फिल्म में मेजर जसवंत सिंह का किरदार निभाया था. ‘शोले’ में संजीव कुमार का ठाकुर वाला रोल मेजर जसवंत से मिलता जुलता था. दोनों ठाकुओं के सफाए की कसम खाते हैं. अमजद खान को गब्बर सिंह के रोल में इतनी पॉप्युलैरिटी मिली कि यही नाम उनकी पहचान बन गया.

यह भी दिलचस्प फैक्ट है कि ‘मेरा गांव मेरा देश’ और ‘शोले’ दोनों दोनों ही फिल्मों में धर्मेंद्र ने काम किया. ‘मेरा गांव मेरा देश’ में धर्मेंद्र, आशा पारेख को बंदूक चलाना सिखाते हैं. ‘शोले’ में धर्मेंद्र, बसंती यानी हेमा मालिनी को बंदूक चलाना सिखाते हैं. यानी दोनों फिल्में में यह सीन एक जैसा ही था. ‘मेरा गांव मेरा देश’ में पौने घंटे बाद ‘जब्बर सिंह’ यानी विनोद खन्ना की एंट्री होती है. उनकी एंट्री होते ही फिल्म में रोमांच आ जाता है. वहीं ‘शोले’ में भी पूरे एक घंटे बाद पर्दे पर गब्बर सिंह यानी अमजद खान आते हैं. अमजद खान ने अपने अभिनय का जादू ऐसा बिखेरा कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में उनका नाम अमर हो गया.

‘मेरा गांव मेरा देश’ में अजित बने धर्मेंद्र जहां सिक्का उछालकर कोई बड़ा फैसला लेते हैं, वहीं ‘शोले’ फिल्म में जय (अमिताभ बच्चन) सिक्का उछालते हैं. शोले मूवी हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्म मानी जाती है. इसके हर सीन-हर डायलॉग, हर किरदार के बारे में सिनेप्रेमी जानते हैं. सिनेमा के इतिहास में सबसे ज्यादा टिकट बिकने का वर्ल्ड रिकॉर्ड शोले के नाम है. 1975 में इस फिल्म ने उस समय 50 करोड़ का कलेक्शन किया था.

‘शोले’ फिल्म रिलीज होने के पूरे 11 साल बाद सुभाष घई ने इसी मूवी से मिलती-जुलती कहानी पर एक फिल्म ‘कर्मा’ बनाई.
कर्मा फिल्म में दिलीप कुमार, जैकी श्रॉफ-अनिल कपूर और नसीरुद्दीन शाह अहम भूमिकाओं में थे. फिल्म 8 अगस्त 1986 को रिलीज हुई थी. शोले फिल्म में ठाकुर दो कैदियों जय-वीरू की मदद लेकर गब्बर सिंह से बदला लेता है. वहीं, कर्मा में जेलर दिलीप कुमार के परिवार को विलेन डॉ. डैंग खत्म (अनुपम खेर) कर देता है. बाद में दिलीप कुमार तीन कैदियों (अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ और नसीरुद्दीन शाह) की मदद से डॉ. डैंग से बदला लेते हैं. इसी तरह की कहानी ‘मेरा गांव मेरा देश’ में भी देखने को मिली थी. साढ़े तीन करोड़ के बजट में बनी ‘कर्मा’ ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई थी.

