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बॉलीवुड में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की क्रांति लाने वाले विजू शाह का सफर बेहद दिलचस्प है. बचपन में स्कूल बंक कर रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचे विजू ने ही फिल्म ‘डॉन’ की कल्ट सिग्नेचर ट्यून बनाई थी. मूल रूप से गुजराती इस परिवार का मुंबई में किराना स्टोर था. उनके पिता कल्याणजी और चाचा आनंदजी ने संगीत की शुरुआती तालीम एक ऐसे गुरु से ली थी, जो दुकान से उधार राशन के बदले उन्हें संगीत सिखाते थे. आगे चलकर विजू शाह ने ‘मोहरा’, ‘त्रिदेव’ और ‘गुप्त’ जैसी फिल्मों में ‘टिप टिप बरसा पानी’ और डार्क ट्रान्स म्यूजिक देकर इतिहास रच दिया.
ऐसे तैयार हुई थी अमिताभ बच्चन की ‘डॉन’ की सिग्नेचर ट्यून.
नई दिल्ली. अमिताभ बच्चन की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘डॉन’ (1978) के कल्ट गाने ‘ये मेरा दिल यार का दीवाना’ की धुन में छुपा एक दिलचस्प किस्सा आज भी लोगों को हैरान करता है. दरअसल, इस गाने की मशहूर बैकग्राउंड सिग्नेचर ट्यून किसी बड़े उस्ताद ने नहीं, बल्कि स्कूल बंक करके चुपके से बॉम्बे के रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचे एक बच्चे ने सिंथेसाइजर पर तैयार की थी. इलेक्ट्रॉनिक कीबोर्ड पर इस जादुई धुन को बिखेरने वाला वह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि दिग्गज संगीतकार कल्याणजी के बेटे विजय कल्याणजी शाह थे, जिन्हें आज पूरी दुनिया विजू शाह के नाम से जानती है.
विजू शाह का जन्म 5 जून 1959 को बॉम्बे में हुआ था. इसी वर्ष उनके पिता कल्याणजी वीरजी शाह को फिल्म ‘नागिन’ (1954) में ‘बीन’ की धुन के लिए बजाए गए क्लेवियोलिन (एक प्रारंभिक इलेक्ट्रॉनिक कीबोर्ड) के लिए देशव्यापी पहचान मिली थी. इसी दौर में उनके पिता ने कल्याणजी वीरजी एंड पार्टी ऑर्केस्ट्रा की नींव रखी और इसी साल 1956 में महान गीतकार आनंद बख्शी ने भी अपने करियर की शुरुआत की, जो आगे चलकर विजू शाह के सबसे करीबी सहयोगी बने.
मजेदार है कल्याणजी-आनंदजी से जुड़ा यह किस्सा
विजू शाह का परिवार मूल रूप से गुजरात के कच्छ का रहने वाला था, जो मुंबई आकर गिरगांव में बस गया. वहां उनका एक किराना स्टोर था. एक दिलचस्प किस्सा यह है कि उनके पिता कल्याणजी वीरजी शाह और चाचा आनंदजी वीरजी शाह ने संगीत की अपनी शुरुआती शिक्षा एक ऐसे शिक्षक से ली थी, जो दुकान से उधार राशन लेने के बदले में उन्हें संगीत सिखाता था.
विजू शाह ने इस फिल्मों के संगीत को निखारा
मराठी और गुजराती संस्कृति के बीच पले-बढ़े विजू शाह ने महज 4-5 साल की उम्र में हारमोनियम सीख ली थी. लेकिन उनकी असली दीवानगी तब जगी जब 1970 के दशक में सिंथेसाइजर की एंट्री भारत में हुई. फिरोज खान की फिल्मों ‘कुर्बानी’ (1980) और ‘जांबाज’ (1986) के इलेक्ट्रॉनिक संगीत को निखारने के बाद उन्होंने 1988 में अपना साहसिक सोलो एल्बम ‘वाय नॉट सिंथेसाइजर’ रिलीज किया.
बेस्ट बैकग्राउंड स्कोर के लिए मिला अवॉर्ड
विजू शाह और निर्देशक राजीव राय की जोड़ी ने 1990 के दशक में हिंदी सिनेमा को एक नया साउंड दिया. ‘त्रिदेव’ (1989) का ब्लॉकबस्टर गाना ‘ओये ओये’ लोकप्रिय हुआ. इसके बाद ‘विश्वात्मा’ (1992) का ‘सात समुंदर पार’ आया था. ‘मोहरा’ (1994) के गाने ‘तू चीज बड़ी है मस्त मस्त’ और ‘टिप टिप बरसा पानी’ ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और इस एल्बम की 8 मिलियन से अधिक प्रतियां बिकीं. ‘गुप्त’ (1997) में उन्होंने पहली बार भारतीय सिनेमा में डार्क ट्रान्स और गैराज संगीत का परिचय कराया, जिसने उन्हें 1998 में सर्वश्रेष्ठ बैकग्राउंड स्कोर का फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया.
साल 2020 में विजू शाह ने की वापसी
साल 2020 में नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘क्लास ऑफ 83’ के साथ विजू शाह ने प्रामाणिक 1980 के दशक के सिंथ स्कोर के साथ वापसी की. इसके बाद, लगभग दो दशकों के अंतराल के बाद राजीव राय और विजू शाह की ऐतिहासिक जोड़ी ने साल 2025 में ‘जोरा’ नामक कम बजट की सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म के साथ धमाकेदार वापसी की, जिसे सीधे यूट्यूब पर रिलीज किया गया.
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कामता प्रसाद (KP) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास मीडिया इंडस्ट्री में काम करने का 11 सालों का लंबा अनुभव है. वर्तमान में वह न्यूज18 हिंदी में बतौर सीनियर सब एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. कामता को एंटरटेनमेंट …और पढ़ें

