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रेलवे प्लेटफॉर्म से ऑस्कर तक, घर से भाग मुंबई आया 16 साल का लड़का, जिसने भारतीय सिनेमा को दी अमर पहचान

नई दिल्ली. एक 16 साल का लड़का… आंखों में फिल्मों का सपना, जेब में ज्यादा पैसे नहीं और दिल में बस मुंबई पहुंचने की जिद. परिवार चाहता था कि वह जिम्मेदारियां समझे, लेकिन उसे तो पर्दे की चमक अपनी ओर खींच रही थी. फिल्मों का ऐसा जुनून कि चोरी-छिपे ट्रेन पकड़कर शहर-शहर सिनेमा देखने निकल पड़ता था. जब घरवालों को पता चला तो डांट भी पड़ी, पिटाई भी हुई और वापस गांव ले जाया गया, लेकिन सपने कहां रुकने वाले थे. मुंबई पहुंचने के बाद उसने रेलवे प्लेटफॉर्म पर रातें बिताईं, स्टूडियो के बाहर घंटों खड़ा रहा और छोटे-छोटे रोल करते हुए संघर्ष जारी रखा. धीरे-धीरे यही लड़का कैमरे के पीछे ऐसा जादू रचेगा, जो भारतीय सिनेमा को दुनिया भर में नई पहचान दिलाएगा. उसकी बनाई एक फिल्म ऑस्कर तक पहुंची और आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे महान फिल्मों में गिनी जाती है.

भारतीय सिनेमा जगत को यादगार और कभी पुरानी न होने वाली मदर इंडिया जैसी फिल्में देने वाले निर्माता-निर्देशक महबूब खान की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी. बचपन में फिल्मों का ऐसा जुनून था कि वह रोज ट्रेन पकड़कर आसपास के शहरों के साथ ही मुंबई तक फिल्में देखने चले जाते थे. एक दिन जब परिवार को उनके मुंबई भागने की भनक लगी, तो पिता ने उन्हें पकड़कर डांटा, पिटाई की और वापस गांव ले आए.

जब मजबूत होता गया अभिनेता बनने का सपना

हालांकि, फिल्मों के प्रति उनका प्यार कभी कम नहीं हुआ. यही लड़का आगे चलकर ‘मदर इंडिया’ जैसी ऐतिहासिक फिल्म बनाने वाला दिग्गज निर्देशक बना. महबूब खान का जन्म 9 सितंबर 1907 को गुजरात के बड़ौदा के पास स्थित सरार गांव में हुआ था. उनका परिवार बेहद साधारण था और आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी. बचपन से ही उन्हें फिल्मों और अभिनय का शौक था. वह चोरी-छिपे ट्रेन में बैठकर आसपास के कस्बों और शहरों में फिल्में देखने चले जाते थे और फिर घर लौट आते थे. धीरे-धीरे उनके मन में अभिनेता बनने का सपना मजबूत होता गया.

महबूब खान ने आज ही के दिन दुनिया को अलविदा कहा था.

रेलवे गार्ड से कर जब पहुंचे मुंबई

कहा जाता है कि उनकी दोस्ती एक रेलवे गार्ड से हो गई थी. उस गार्ड ने उन्हें मुंबई जाकर फिल्मों में किस्मत आजमाने की सलाह दी. महज 16 साल की उम्र में महबूब खान घर छोड़कर मुंबई पहुंच गए. हालांकि, उनके पिता को इसकी जानकारी मिल गई. वह मुंबई पहुंचे, बेटे को ढूंढा और वापस गांव ले आए. परिवार ने उनकी शादी भी कर दी ताकि उनका ध्यान फिल्मों से हट जाए लेकिन महबूब खान के भीतर का सपना खत्म नहीं हुआ. कुछ समय बाद वह फिर मुंबई पहुंचे. शुरुआती दिनों में उन्होंने काफी संघर्ष किया.वह मुंबई के वीटी स्टेशन के पास स्थित ज्योति स्टूडियो के बाहर घंटों खड़े रहते थे ताकि किसी तरह फिल्मों में काम मिल सके. कई रातें उन्होंने रेलवे प्लेटफॉर्म पर बिताईं. आखिरकार उनकी मुलाकात फिल्मकार अर्देशिर ईरानी से हुई, जिन्होंने उन्हें फिल्मों में छोटे-छोटे रोल दिए। यहीं से उनकी फिल्मी यात्रा शुरू हुई.

जब समझ आया अभिनय नहीं निर्देशन और कहानी में है रुचि

शुरुआत में महबूब खान ने बतौर जूनियर आर्टिस्ट और सपोर्टिंग एक्टर काम किया लेकिन जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि अभिनय से ज्यादा उनकी रुचि निर्देशन और कहानी लिखने में है. उन्होंने अपनी कहानी लिखनी शुरू की और कई प्रोड्यूसर्स के पास गए. शुरुआत में उन्हें निराशा हाथ लगी, लेकिन साल 1935 में उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘अल हिलाल’ रिलीज हुई, जिसने उन्हें पहचान दिलाई.

महिला किरदारों को मिलती थी खास जगह

इसके बाद उन्होंने ‘डेक्कन क्वीन’, ‘औरत’, ‘रोटी’, ‘अनमोल घड़ी’, ‘अंदाज’, ‘आन’ और ‘अमर’ जैसी कई सफल फिल्मों का निर्देशन किया. उनकी फिल्मों में मजबूत महिला किरदारों को खास जगह मिलती थी. यही वजह है कि उन्हें अपने समय का प्रगतिशील और संवेदनशील फिल्मकार माना जाता है. साल 1952 में उन्होंने मुंबई के बांद्रा इलाके में महबूब स्टूडियो की स्थापना की, जो उस दौर का आधुनिक फिल्म स्टूडियो माना जाता था। आज भी वहां फिल्मों और टीवी शो की शूटिंग होती है.

ऑस्कर में गई थी महबूब खान की ये फिल्म

महबूब खान के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 1957 में आई फिल्म ‘मदर इंडिया’ मानी जाती है. नरगिस, सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार अभिनीत इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. यह फिल्म ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए भी नामांकित हुई थी. ‘मदर इंडिया’ को आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे महान फिल्मों में गिना जाता है. 28 मई 1964 को महज 56 साल की उम्र में महबूब खान का निधन हो गया.

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