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‘100 लोग दौड़े चले आएंगे जब औरत को’, सिनेमा की ‘गंदी सोच’ की जब स्मिता पाटिल ने उधेड़ी बखिया

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एक्ट्रेस स्मिता पाटिल ने दशकों पहले फिल्मों में महिलाओं को कामुक दिखाने जैसे मुद्दों पर खुलकर आवाज उठाई थी. सिनेमा की इस मजबूत एक्ट्रेस ने हमेशा कमर्शियल फायदे के लिए महिलाओं के शरीर के दिखावे की कड़ी आलोचना की थी. उन्होंने अपने एक वायरल इंटरव्यू में साफ कहा था कि दर्शकों पर जबरन आधा-नंगा शरीर परोसने की सोच गलत है. अगर फिल्म सच्चे दिल से बनाई जाए तो वह अपने दम पर चलती है.

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नई दिल्ली: स्मिता पाटिल ने ‘भूमिका’, ‘मंथन’, ‘आक्रोश’, ‘अर्ध सत्य’ और ‘मिर्च मसाला’ जैसी बेहतरीन फिल्मों में अपनी शानदार एक्टिंग का लोहा मनवाया. वे कभी भी अपनी बात खुलकर रखने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाती थीं. सिनेमा की दुनिया में जब आज मर्दों के नजरिए से फिल्में बन रही हैं, तो महिलाओं को कामुक दिखाने जैसे मुद्दों पर स्मिता पाटिल के बेबाक नजरिये का ध्यान आता है. उन्होंने दशकों पहले ही इस तरह के सवाल उठाए थे.

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एक वो दौर था जब फिल्मों को हिट कराने के लिए ग्लैमर को एक बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था. उस दौर में भी स्मिता पाटिल ने फिल्म इंडस्ट्री की इस सोच की खुलकर आलोचना की थी. उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने के लिए महिलाओं के शरीर का सहारा लिया जाए. उन्होंने हमेशा इस शॉर्टकट का विरोध किया.

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बाकी हीरोइनों से अलग स्मिता ने अपने करियर में हमेशा ऐसी कहानियों को चुना जो जमीन से जुड़ी और सच्ची थीं. उनके निभाए किरदार सीधे-साधे या सतही नहीं होते थे, बल्कि उनमें एक आम इंसान की तरह उलझनें, कमजोरियां और साथ ही एक गजब की मजबूती दिखाई देती थी. पैरेलल सिनेमा के जरिए उन्होंने बड़े पर्दे पर महिलाओं की एक बिल्कुल नई और गरिमामई इमेज पेश की.

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स्मिता पाटिल का मानना था कि सिनेमा का काम समाज की कड़वी सच्चाइयों को दिखाना है, न कि सिर्फ झूठा मनोरंजन परोसना. फिल्मों को लेकर उनकी यही ईमानदारी और सोच, इंडस्ट्री के मार्केटिंग के तौर-तरीकों पर दिए गए उनके बयानों में भी साफ झलकती थी. वे फिल्म बेचने के घटिया तरीकों के सख्त खिलाफ थीं.

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स्मिता पाटिल का एक पुराना इंटरव्यू सोशल मीडिया पर आज भी खूब देखा जाता है. उन्होंने इस इंटरव्यू में फिल्म मेकर्स की उस मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया था, जो फिल्म को हिट कराने के लिए हीरोइनों को सिर्फ एक ऑब्जेक्ट या ग्लैमर के तौर पर इस्तेमाल करते थे, जबकि पुरुष कलाकारों से ऐसी कोई उम्मीद नहीं की जाती थी.

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स्मिता ने अपनी बात रखते हुए कहा था, ‘फिल्मों में हीरो को तो इस तरह दिखा नहीं सकते और उससे कोई फायदा भी नहीं होने वाला. लेकिन मेकर्स को लगता है कि अगर औरत को कम कपड़ों में दिखाएंगे, तो सौ लोग और खिंचे चले आएंगे. हमारे देश की ऑडियंस पर यह बात जबरदस्ती थोपी गई है कि फिल्म में आधा नंगा शरीर है, इसलिए फिल्म देखने आओ. यह सोच पूरी तरह से गलत है.’

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स्मिता पाटिल का मानना था कि अगर कोई फिल्म सच्चे दिल से बनाई गई है और उसमें कोई अच्छी बात कही गई है, तो वह अपने दम पर जरूर चलेगी. फिल्म को चलाने के लिए ऐसे अश्लील पोस्टरों या सीन्स की कोई जरूरत नहीं होती. उनकी यही दूरदर्शी सोच उन्हें अपने समय के बाकी कलाकारों से बहुत आगे और खास बनाती थी.

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स्मिता पाटिल का प्रसव से जुड़ी दिक्कतों के कारण महज 31 साल की उम्र में देहांत हो गया था. भले ही उनका जीवन छोटा रहा, लेकिन भारतीय सिनेमा पर छोड़ी गई उनकी छाप अमिट है. सिनेमा को अपनी महिलाओं और दर्शकों का सम्मान पूरी ईमानदारी के साथ करना चाहिए.

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