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महान संगीतकार नौशाद अली ने स्ट्रगल के दिनों में दादर के जिस थिएटर के बाहर फुटपाथ पर रातें गुजारीं, 16 साल बाद उसी थिएटर में अपनी फिल्म ‘बैजू बावरा’ के प्रीमियर पर उनकी आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने शास्त्रीय संगीत को जन-जन तक पहुंचाया और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी अमर फिल्मों में संगीत दिया. दादासाहेब फाल्के और पद्मभूषण से सम्मानित नौशाद साहब ने कम मगर अहम काम किया. 5 मई 2006 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका जादुई संगीत आज भी जीवित है.

नई दिल्ली: फिल्म संगीत की दुनिया के बेताज बादशाह नौशाद अली साहब का जिक्र आते ही जेहन में सादगी और सुरों का एक समंदर उमड़ पड़ता है. आज 5 मई को उनकी पुण्यतिथि है और इस मौके पर उनके स्ट्रगल की वह कहानी याद आती है जो किसी फिल्मी पर्दे से कम नहीं है. नौशाद साहब का जीवन सिर्फ कामयाबी की दास्तां नहीं है, बल्कि यह उस सब्र और मेहनत की कहानी है जिसने एक आम इंसान को संगीत का ‘मुगल-ए-आजम’ बना दिया. (फोटो साभार: Instagram@bollywood.nostalgia)

बात 5 अक्टूबर 1952 की है, जब दादर के ब्रॉडवे थिएटर में नौशाद की फिल्म ‘बैजू बावरा’ का भव्य प्रीमियर चल रहा था. हर तरफ जश्न का माहौल था, लेकिन संगीतकार नौशाद हॉल के बाहर बालकनी में अकेले खड़े होकर फफक-फफक कर रो रहे थे. उनकी आंखों से गिरते आंसू खुशी के थे या पुराने जख्मों के, यह समझना मुश्किल था. उन्हें इस तरह रोता देख फिल्म के निर्देशक विजय भट्ट हैरान रह गए और उनके पास जाकर रोने की वजह पूछ ली. (फोटो साभार: IMdb)

नौशाद का जन्म 25 दिसंबर 1919 को लखनऊ की गलियों में हुआ था. उनके पिता अदालत में मुंशी थे और चाहते थे कि बेटा भी कुछ ऐसा ही काम करे, लेकिन नौशाद के दिल में तो कव्वालियों और संगीत की मिठास थी. देवा शरीफ की दरगाह पर सुनी गई कव्वालियों ने उनके भीतर संगीत की ऐसी लौ जगाई कि वो सब कुछ छोड़कर मुंबई आ गए. उन्होंने शुरूआती दिनों में वो गरीबी और मुफलिसी देखी, जिसकी कल्पना करना भी आज मुश्किल है.
(फोटो साभार: IMDb)
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‘बैजू बावरा’ उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई. उन्होंने इस फिल्म में शास्त्रीय संगीत को आम आदमी की जुबान पर चढ़ा दिया. ‘मन तड़पत हरि दर्शन को’ और ‘आज गावत मन मे’ जैसे गानों ने उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड दिलाया. इसके बाद तो उन्होंने ‘मदर इंडिया’, ‘मुगल-ए-आजम’ और ‘गंगा जमुना’ जैसी कालजयी फिल्मों में ऐसा संगीत दिया कि लोग उनके कायल हो गए. अनारकली का ‘प्यार किया तो डरना क्या’ आज भी हर प्रेमी की पहली पसंद है. (फोटो साभार: IMDb)

नौशाद साहब की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने ज्यादा काम के बजाय उसकी क्वालिटी पर ध्यान दिया. उन्होंने अपने पूरे करियर में 100 से भी कम फिल्में कीं, लेकिन उनमें से ज्यादातर फिल्में सिल्वर या गोल्डन जुबली रहीं. उन्होंने मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और मुकेश जैसे दिग्गजों से ऐसे गाने गवाए जो आज भी ताजा लगते हैं. उनके संगीत में भारतीय मिट्टी की खुशबू और शास्त्रीय संगीत की गहराई साफ झलकती थी. (फोटो साभार: IMDb)

नौशाद संगीत के प्रति अपने लगाव के चलते दादासाहेब फाल्के और पद्मभूषण जैसे बड़े सम्मानों से नवाजे गए. इतना ही नहीं, वह एक बेहतरीन शायर भी थे और उनकी किताब ‘आठवां सुर’ उनके भीतर के कवि को बखूबी दर्शाती है. उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया, जो इस बात का सबूत है कि भारतीय संस्कृति में उनका योगदान कितना बड़ा और अहम रहा है. (फोटो साभार: IMDb)

5 मई 2006 को महान संगीतकार इस दुनिया से रुखसत हो गया, लेकिन उनका संगीत आज भी अमर है. नौशाद साहब हमें सिखा गए कि अगर आपके सपनों में जान है और आप फुटपाथ पर सोते हुए भी आसमान की तरफ देखने का हौसला रखते हैं, तो एक दिन दुनिया आपके कदमों में होती है. (फोटो साभार: IMDb)

