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नए दौर के गानों के बीच भी 68 साल पुराने इस गाने की चमक फीकी नहीं पड़ी. यही किसी क्लासिक गीत की सबसे बड़ी पहचान होती है कि वक्त बदल जाए, लेकिन उसका असर कभी कम न हो. सालों बाद भी यह गीत सुनते ही दिल में वही पुरानी मिठास और सुकून उतर आता है. इस गाने की खासियत है कि न तो इसमें तेज बीट्स हैं, न भारी म्यूजिक, फिर भी इस गाने की मासूमियत लोगों को बांधे रखती है. मजरूह सुल्तानपुरी के खूबसूरत बोल और हेमंत कुमार की मखमली आवाज ने इसे ऐसा क्लासिक बना दिया, जिसकी चमक वक्त के साथ कभी फीकी नहीं पड़ी. चलिए बताते हैं कौन सा है ये गाना…

नई दिल्ली. आज के दौर में ‘केसरिया’, ‘तुम ही हो’ और ‘रतिया लांबिया’ जैसे रोमांटिक गाने युवाओं की प्लेलिस्ट पर राज करते हैं. सोशल मीडिया रील्स से लेकर शादी-पार्टियों तक, हर जगह नए गानों का क्रेज देखने को मिलता है. लेकिन इन सबके बीच हिंदी सिनेमा का एक ऐसा रोमांटिक गीत भी है, जिसका जादू 68 साल बाद भी कम नहीं हुआ. एक ऐसा गाना, जिसे सुनते ही पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं, दिल मुस्कुरा उठता है और मोहब्बत की मासूमियत आंखों के सामने उतर आती है. दिलचस्प बात ये है कि इस गीत में न भारी म्यूजिक था, न हाई बीट्स और न ही बड़े-बड़े शब्द. फिर भी मजरूह सुल्तानपुरी की कलम और हेमंत कुमार की आवाज ने इसे ऐसा अमर बना दिया कि आज भी इसे हिंदी सिनेमा के सबसे खूबसूरत रोमांटिक गीतों में गिना जाता है.

आज के दौर में जब गाने दो-चार हफ्ते में पुराने हो जाते हैं, तब एक ऐसा गाना है जो 1958 में रिलीज होने के बावजूद आज भी 68 साल बाद नंबर-1 की हैसियत रखता है. ये गाना है- ‘है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पे आएगा…’. मजरूह सुल्तानपुरी की कलम से निकली ये पंक्तियां, हेमंत कुमार की मधुर आवाज और एस.डी. बर्मन के जादुई संगीत ने मिलकर बॉलीवुड के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी.

फिल्म का नाम है ‘सोलवां साल’… राज खोसला द्वारा निर्देशित यह फिल्म 1958 में रिलीज हुई थी. मुख्य भूमिकाओं में देव आनंद और वहीदा रहमान थे. फिल्म की कहानी एक रात में घटित होने वाली घटनाओं पर आधारित है.
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फिल्म की कहानी की बात करें तो लाज (वहीदा रहमान) अपनी सहेली के साथ घर से भागकर बॉम्बे आती है. उसके प्रेमी श्याम (जगदेव) के साथ वो एलोपमेंट करने वाली है. दोनों परिवार की बहुमूल्य नेकलेस भी साथ ले आते हैं, जिसे गिरवी रखकर नई जिंदगी शुरू करने का प्लान है.लेकिन ट्रेन में ही श्याम लाज को धोखा दे देता है. नेकलेस लेकर वो फरार हो जाता है. इसी ट्रेन में सफर कर रहे जांबाज पत्रकार प्रणनाथ कश्यप (देव आनंद) पूरी घटना देख लेते हैं. वे लाज की मदद करते हैं और दोनों मिलकर उस चोर प्रेमी को ढूंढने निकल पड़ते हैं. पूरी फिल्म एक रात की कहानी है-रोमांच, धोखा, रोमांस और अंत में सच्चे प्यार की जीत. फिल्म में टुन-टुन, जगदीप, सुंदर जैसे कलाकार भी थे.

फिल्म का सबसे यादगार सीन वो है, जब देव आनंद ट्रेन में वहीदा रहमान के साथ ‘है अपना दिल तो आवारा, ना जाने किस पे आएगा’ गाने को गाते हैं. हेमंत कुमार की आवाज में गाया गया यह गाना ट्रेन की खिड़की से बहती हवा, रात के सफर और नई-नई प्यार की शुरुआत का प्रतीक बन गया.

मजरूह सुल्तानपुरी ने बेहद सरल, मगर दिल को छू लेने वाले शब्दों में प्यार की बेफिक्री और आवारगी को बयां किया. एस.डी. बर्मन का हल्का-फुल्का संगीत और राहुल देव बर्मन द्वारा बजाया गया माउथ ऑर्गन इस गाने को और खास बना गया. ‘सोलवां साल’ बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रही. राज खोसला की डायरेक्टोरियल और देव-वहीदा की जोड़ी ने फिल्म को यादगार बना दिया.

1958 में बिनाका गीतमाला के अंतिम चार्ट पर यह गाना नंबर-1 रहा. आज भी शादियों, पार्टी और रोमांटिक प्लेलिस्ट में यह गाना बजता है. हेमंत कुमार, जिनकी आवाज आमतौर पर गंभीर और भावुक गीतों के लिए जानी जाती थी, इस गाने में पूरी तरह अलग अंदाज में नजर आए. देव आनंद की स्टाइलिश अदाकारी और वहीदा रहमान की नाजुक सुंदरता ने गाने को अमर बना दिया.

नए दौर के गानों के बीच भी ‘है अपना दिल तो आवारा’ की चमक फीकी नहीं पड़ी. यही किसी क्लासिक गीत की सबसे बड़ी पहचान होती है कि वक्त बदल जाए, लेकिन उसका असर कभी कम न हो.

