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हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता, निर्माता और निर्देशक सुनील दत्त आज भी इंडस्ट्री में सम्मान के साथ याद किए जाते हैं. उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर हिट और फ्लॉप दोनों का दौर देखा और जिया. लेकिन क्या आप उस फिल्म का किस्सा जानते हैं, जिसकी वजह से सुनील दत्त ने अपना बांद्रा स्थित बंगला गिरवी रख दिया था, कारें बेच दीं और दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए थे. क्या है ये किस्सा चलिए बताते हैं.

नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसे बहुत कम कलाकार हुए हैं, जिन्हें दुनिया आज भी उतने ही सम्मान और अदब के साथ याद करती है, जितने वे अपने दौर में थे. जाने-माने अभिनेता और निर्माता सुनील दत्त एक ऐसे ही नायाब हीरा थे. साल 1955 में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले सुनील दत्त ने जब सिनेमा की ‘मदर इंडिया’ यानी नरगिस से शादी की तो उनके घर-संसार की जिम्मेदारी पूरी तरह सुनील दत्त के कंधों पर आ गई. 1963 में उन्होंने फिल्म ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ से प्रोडक्शन की दुनिया में कदम रखा लेकिन सुनील दत्त एक ऐसे दरियादिल और भावुक निर्माता थे जो खर्चों का हिसाब-किताब रखने में कच्चे थे. उनका यही जुनून साल 1971 में आई एक फिल्म की मेकिंग के दौरान उन पर ऐसा भारी पड़ा कि वे पूरी तरह कंगाल हो गए.

बात कर रहे हैं आइकॉनिक फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ की, जिसने सुनील दत्त को बांद्रा स्थित अपना आलीशान बंगला तक गिरवी रखने पर मजबूर कर दिया था. इस मल्टी-स्टारर फिल्म में सुनील दत्त के अलावा वहीदा रहमान, राखी और अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिकाओं में थे. फिल्म में अमिताभ बच्चन ने सुनील दत्त के गूंगे भाई का किरदार निभाया था. इसके पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और नरगिस के बीच बेहद गहरी दोस्ती थी. इंदिरा गांधी की मां और अमिताभ की मां तेजी बच्चन भी इलाहाबाद के दिनों से बेहद करीब थीं. इंदिरा गांधी की सिफारिश पर नरगिस ने सुनील दत्त से अमिताभ को फिल्म में लेने के लिए कहा. लेकिन दत्त साहब को अमिताभ की आवाज से नफरत थी. यही वजह थी कि उन्होंने अमिताभ को फिल्म में एक ऐसे किरदार में कास्ट किया जो बोल नहीं सकता था.
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सुनील दत्त ने इस फिल्म को सिर्फ 15 दिनों में निपटाने का प्लान बनाया था. लगभग 100 लोगों के क्रू के साथ वे जैसलमेर से 80 मील दूर ‘पोचिना’ नाम के एक छोटे से गांव में तंबू गाड़कर रहने लगे. लेकिन परफेक्ट शॉट के चक्कर में 15 दिन का शेड्यूल दो महीने से ज्यादा खींच गया, जिसने फिल्म का बजट आसमान पर पहुंचा दिया. सुनील दत्त काम में इस कदर परफेक्शन चाहते थे कि जिसका खामियाजा उनके परिवार को भुगतना पड़ा. उनकी बेटी नम्रता दत्त ने अपनी किताब ‘मिस्टर एंड मिसेज दत्त: मेमोरीज ऑफ अवर पेरेंट्स’ में लिखा है ‘एक सीन के लिए पापा को पूरे 100 ऊंट चाहिए थे, लेकिन सेट पर सिर्फ 99 ऊंट ही आ पाए. पापा इतने अड़ गए कि उन्होंने शूटिंग करने से साफ मना कर दिया.’

जब फिल्म रिलीज हुई तो यह बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई. हालांकि, ‘रेशमा और शेरा’ ने 3 नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते और यह ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि भी बनी, लेकिन यह कामयाबी सुनील दत्त को आर्थिक तबाही से नहीं बचा सकी. किश्वर देसाई की किताब ‘डार्लिंगजी’ के मुताबिक, सुनील दत्त इस कदर दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए थे कि उन्हें अपनी कई गाड़ियां बेचनी पड़ीं. उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए ताबड़तोड़ फिल्में साइन करना शुरू कर दिया, जिनमें ‘हीरा’, ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ और ‘गीता मेरा नाम’ जैसी फिल्में शामिल थीं.

दत्त परिवार के लिए वह दौर किसी बुरे सपने जैसा था. हालात इतने खराब थे कि सुनील दत्त ने अपने प्रोडक्शन ऑफिस के कर्मचारियों को बुलाकर कह दिया कि परिस्थितियां बहुत खराब हैं और वे अकाउंटेंट के अलावा सबको नौकरी से निकाल रहे हैं. हालांकि, वफादार कर्मचारियों फ्री में काम करने के लिए तैयार हो गए.

नम्रता ने अपनी किताब में उन काले दिनों को याद करते हुए लिखा- ‘पापा अक्सर मां को हमारे स्कूल के फटे मोजे और यूनिफॉर्म सिलते हुए देखते थे, क्योंकि हमारे पास नए कपड़े खरीदने के पैसे नहीं थे. लेकिन मां ने कभी कोई शिकायत नहीं की. एक दिन जब घर में खाने तक के पैसे नहीं बचे तो मां ने सिक्कों से भरा अपना एक लंबा गुल्लक का डिब्बा पलटा और बिस्तर पर सिक्के गिनने लगीं. कई घंटों की मशक्कत के बाद इतने पैसे निकल आए कि हमारा अगले 30 दिनों का राशन आ सके.’

जब दत्त परिवार इस भयंकर मंदी से गुजर रहा था, तब अभिनेता विनोद खन्ना को इस बात की भनक लगी. विनोद खन्ना को सुनील दत्त ने ही अपनी 1969 की फिल्म ‘मन का मीत’ से पहला ब्रेक दिया था. विनोद खन्ना ने सुनील दत्त की मदद की और उन्हें फिर से फिल्में शुरू करने के लिए प्रेरित किया. जिसके बाद धीरे-धीरे अभिनय और नए प्रोजेक्ट्स के जरिए सुनील दत्त इस आर्थिक संकट से बाहर निकल पाए थे.

