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चॉल में गुजरे दिन, NSD से चार बार हुए रिजेक्ट, 1 फिल्म से पलटी किस्मत, झटका नेशनल अवॉर्ड

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हिंदी सिनेमा में कुछ कहानियां सिर्फ सफलता की नहीं होतीं, बल्कि हिम्मत, संघर्ष और टूटकर फिर खड़े हो जाने की मिसाल बन जाती हैं. आज जिस कलाकार की बात कर रहें हैं वो न जाने कितनी बार गिरकर खड़े हुए हैं. एक्टर ने अपने करियर में सफलता से ज्यादा असफलता देखी है.

नई दिल्ली. राम गोपाल वर्मा के निर्देशन में बनी एक फिल्म आई थी जिसने इस कलाकार की जिंदगी हमेशा के लिए बदलकर रख दी. इस फिल्म के लिए उन्होंने नेशनल अवॉर्ड भी जीता, लेकिन उनका संघर्ष यहां खत्म नहीं हुआ. नेशनल अवॉर्ड जीतने के बावजूद एक्टर को कमर्शियल फ्रंट पर सक्सेस नहीं मिल पा रही थी. वो सितारा जिसके बारे में आज बात कर रहे हैं वो मनोज बाजपेयी हैं. बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर बॉलीवुड के सबसे सम्मानित अभिनेताओं में जगह बनाना आसान नहीं था. लेकिन मनोज ने यह साबित कर दिया कि अगर इंसान के भीतर जुनून जिंदा हो, तो असफलताएं भी उसकी राह नहीं रोक सकतीं. (फोटो साभार इंस्टाग्राम bajpayee.manoj)

23 अप्रैल 1969 को बिहार के बेतिया जिले के बेलवा गांव में जन्मे मनोज बाजपेयी का बचपन बेहद साधारण माहौल में बीता. एक्टर का जन्म किसान परिवार में हुआ था जिनके लिए फिल्में और ग्लैमर बहुत दूर की बातें थीं. छोटे से गांव में जन्म लेने के बावजूद न जाने कहां से मनोज बाजपेयी के अंदर फिल्मी पर्दे पर कुछ कर दिखाने की ललक थी. (फोटो साभार इंस्टाग्राम bajpayee.manoj)

मनोज बचपन से ही फिल्मों और अभिनय की तरफ आकर्षित थे और उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें जिंदगी में कुछ अलग करना है. सिर्फ 17 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिल्ली पहुंच गए. (फोटो साभार इंस्टाग्राम bajpayee.manoj)

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उस समय उनके पास न पैसा था, न कोई फिल्मी पहचान और न ही कोई मजबूत सहारा. दिल्ली आकर उन्होंने रामजस कॉलेज में दाखिला लिया और थिएटर की दुनिया में खुद को पूरी तरह झोंक दिया. अभिनय उनके लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि जिंदगी बन चुका था. (फोटो साभार इंस्टाग्राम bajpayee.manoj)

दिल्ली में पढ़ाई करने के दौरान ही मनोज बाजपेयी ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में एडमिशन के लिए अप्लाई किया, लेकिन वो एक, दो बार नहीं बल्कि चार बार रिजेक्ट हुए थे. एनएसडी से चार-चार बार रिजेक्ट होने के बाद मनोज बाजपेयी की हिम्मत मानों टूटने लगी थी. उन्हें लगने लगा था कि जैसे वो कुछ कर ही नहीं पाएंगे. (फोटो साभार इंस्टाग्राम bajpayee.manoj)

एक्टर ने अपने पुराने इंटरव्यू में इस बात का जिक्र किया था कि बार-बार रिजेक्शन झेलकर वो इतना थक चुके थे कि वो अपनी जिंदगी खत्म करने के बारे में सोचने लगे थे. वो डिप्रेशन का शिकार हो गए थे. SD में प्रवेश न मिलने के बाद उन्होंने मशहूर थिएटर गुरु बैरी जॉन से अभिनय सीखा. कई सालों तक उन्होंने स्ट्रीट प्ले और स्टेज थिएटर किए. उन्हीं वर्षों में उनकी अभिनय की बुनियाद इतनी मजबूत हुई, जिसने आगे चलकर उन्हें अलग पहचान दिलाई. (फोटो साभार इंस्टाग्राम bajpayee.manoj)

दिल्ली में एक्टिंग सीखने के बाद मनोज बाजपेयी अपनी आंखों में सपने लिए उन्हें सच करने पहुंचे सपनों की नगरी मुंबई. लेकिन यहां भी उनका सफर आसान नहीं था. उन्हें एक दो बार नहीं, कई बार रिजेक्शन झेलने पड़े थे. पहले काम पाने की जद्दोजहद थी और फिर फिल्मों के हिट होने की जद्दोजहद रही. (फोटो साभार इंस्टाग्राम bajpayee.manoj)

निर्देशक राम गोपाल वर्मा की फिल्म सत्या में ‘भीकू म्हात्रे’ का किरदार निभाकर मनोज बाजपेयी ने पूरे देश को चौंका दिया. मनोज बाजपेयी के अभिनय को काफी सराहा गया. गैंगस्टर के रूप में वो छा गए, राम गोपाल वर्मा की फिल्म ने एक्टर को उनका पहला नेशनल अवॉर्ड भी दिलाया. (फोटो साभार इंस्टाग्राम bajpayee.manoj)

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