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सुपरहिट वेब सीरीज ‘पंचायत’ के प्रधानजी यानी रघुबीर यादव ने हाल ही में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. उन्होंने बताया कि एक वक्त ऐसा भी था जब वह महज ढाई रुपये में अपना गुजारा करते थे और कई बार उन्हें सिर्फ चटनी-रोटी खाकर ही पेट भरना पड़ता था. हालांकि, इतनी तंगहाली और दिक्कतों के बावजूद वह इसे स्ट्रगल नहीं मानते, बल्कि उनके मुताबिक उन्होंने अपनी इस मेहनत के सफर का पूरा आनंद लिया.

नई दिल्ली. रघुबीर यादव अपनी बेहतरीन अदाकारी के लिए जाने जाते हैं. नई पीढ़ी भले ही उन्हें सुपरहिट सीरीज ‘पंचायत’ में प्रधान के रोल से पहचानती है. लेकिन उनका काम सिर्फ इसी एक रोल तक सिमटा हुआ नहीं है. रघुबीर यादव के लिए सिनेमा की दुनिया में अपनी खास पहचान को बनाने का यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं रहा है. हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान रघुबीर यादव ने अपने उतार-चढ़ाव भरे संघर्ष को याद किया, जब वह अपने घर से भाग गए थे.

उन्होंने उन दिनों का जिक्र किया जब वह महज ढाई रुपये में गुजारा करते थे, कई बार भूखे पेट सोते थे और फिल्मी दुनिया में पैर जमाने के लिए करीब 20 साल अपने घर से दूर रहे. एबीपी लाइव से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘एक्टिंग आसान नहीं है, लेकिन इसमें मजा बहुत आता है. लोग इसे स्ट्रगल कहते हैं, पर मैंने अपनी जिंदगी को कभी स्ट्रगल नहीं माना. मैंने बस मेहनत की और उस पूरे सफर का आनंद लिया.’

रघुबीर यादव ने अपनी पढ़ाई-लिखाई से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी शेयर किया, जिसने उनकी पूरी जिंदगी का रुख ही बदल दिया. उन दिनों एक सुरक्षित भविष्य के लिए उन पर साइंस पढ़ने का भारी दबाव था, लेकिन उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि वह बोर्ड परीक्षा पास नहीं कर पाएंगे. जब उन्हें अपनी नाकामी का पूरा भरोसा हो गया, तो उन्होंने एक बड़ा कदम उठाया.
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उन्होंने बताया कि उन्हें पहले से पता था कि वह परीक्षा में फेल होने वाले हैं. परीक्षा के रिजल्ट के डर से वह अपने एक दोस्त के साथ घर छोड़कर भाग गए और भटकते हुए ललितपुर पहुंच गए. वहां उन दिनों मशहूर एक्टर अन्नू कपूर के पिता की एक थियेटर कंपनी नाटक कर रही थी.

यहीं से रघुबीर के थियेटर सफर की शुरुआत हुई. अन्नू कपूर के पिता मदनलाल कपूर ने उन्हें अपनी कंपनी में रख लिया, जहां उन्हें हर दिन के ढाई रुपये मिलते थे. हालांकि, यह मामूली रकम भी उन्हें समय पर या पूरी नहीं मिलती थी. उन्होंने बताया, ‘ढाई रुपये रोज का तय हुआ था, लेकिन कभी-कभी इससे भी कम पैसे मिलते थे. हम लोग उतने ही पैसों में आटा और टमाटर खरीद लाते थे, फिर चटनी और रोटी बनाकर अपना पेट भरते थे.’ कई बार तो कोई उनका बनाया हुआ खाना भी चुरा ले जाता था और उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता था.

इतने तंग हालातों के बावजूद रघुबीर यादव के मन में उस दौर को लेकर कोई कड़वाहट या शिकायत नहीं है. इसके उलट वह उस समय को अपने करियर की मजबूत नींव मानते हैं. उनका कहना है कि उन्हीं सालों ने सिनेमा और एक्टिंग को लेकर उनकी समझ को बदला और तराशा. इसी दौरान उन्होंने उर्दू सीखी, अपने शब्दों के उच्चारण को सुधारा.

उन्होंने उस दौर का एक बेहद भावुक किस्सा भी याद किया. घर छोड़ने के बाद उन्होंने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें उन्होंने वादा किया था कि वह कभी भी कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे परिवार के नाम पर दाग लगे. करीब 6 महीने बाद वह घर लौटे भी थे, लेकिन एक रिश्तेदार के ताने ने उनकी जिंदगी का रास्ता फिर बदल दिया

एक्टर ने याद करते हुए बताया, ‘जब मैं गांव पहुंचा तो मेरे चाचा के लड़के ने कहा कि हमें तो लगा था कि तुम अब सीधे सिनेमा के पर्दे पर ही दिखाई दोगे. मुझे यह बात इतनी चुभ गई और इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि मैं उसी रात दोबारा घर छोड़कर चला गया.’ इस घटना के बाद वह अगले 20 सालों तक अपने गांव वापस नहीं लौटे.

रघुबीर यादव को ‘सलाम बॉम्बे’, ‘लगान’, ‘पीपली लाइव’, ‘पीकू’ और ‘न्यूटन’ जैसी बेहतरीन फिल्मों में उनके शानदार काम के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है. हालांकि, उन्हें घर-घर में असली पहचान साल 1989 में दूरदर्शन के सुपरहिट शो ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ से मिली थी, जिसके बाद वह दर्शकों के चहेते कलाकार बन गए.

