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90 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती सालों में जब बॉलीवुड में रोमांटिक गाने छाए हुए थे. उसी दौर में एक आवाज आई जो सीधे दिल के टुकड़ों को छू जाती थी. अलताफ राजा की वो आवाज, जो दर्द को इतनी सादगी और गहराई से बयान करती थी कि सुनने वाला खुद को गाने का किरदार समझने लगता.
अलताफ राजा के गानों को आज भाी लोग काफी पसंद करते हैं.
नई दिल्ली. कई बार ऐसा होता है कि जब जुबां चुप हो जाती है तो संगीत बोल उठता है. हर जमाने में टूटे हुए दिलों का एक राजा होता है, जिसकी आवाज सुनकर जख्म हरा होने लगते हैं. साल 2000 के दशक की शुरुआत में अगर हिंदी संगीत जगत में ऐसा कोई नाम था, जिसने तकलीफ को अपनी पहचान बनाया तो वह थे अलताफ राजा. उनके एल्बम ‘दिल के टुकड़े हजार हुए’ ने न केवल चार्ट तोड़े, बल्कि एक ऐसा दर्दनाक तराना दिया जो आज भी विरह की आग में जल रहे लोगों के बेहद करीब है.
साल 2000 में रिलीज हुआ यह हिंदी एल्बम इश्तार म्यूजिक के बैनर तले आया था. इसमें कुल 8 गाने थे, जिन्हें अलताफ राजा ने खुद संगीतबद्ध किया था. इससे पहले 1994 में, उन्होंने ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ जैसा सुपरहिट गीत दिया था. लेकिन ‘दिल के टुकड़े हजार हुए’ ने उनके करियर को नई ऊंचाई दी. इस एल्बम का हर गाना जुदाई की आग में जलते हुए इंसान की कहानी कहता है. यह अलताफ राजा की आवाज और भावनात्मक अंदाज का कमाल का नमूना था. भले ही उन्हें 90 के दशक में पहचान मिल गई थी, लेकिन इस एल्बम ने उन्हें ‘दर्द के सुल्तान’ के रूप में स्थापित किया.
अरुण भैरव दर्दभरे बोल
इसी एल्बम का एक गाना है ‘पहले तो कभी कभी था’. जब पहली बार ‘प्यार मोहब्बत के किस्से बेकार हुए, जब देखा तोह दिल के टुकड़े हजार हुए…’ यह लाइन आप कानों में डालते हैं, तो आपको एहसास होता है कि यह सिर्फ एक गाना नहीं है, यह एक दर्द है. गीतकार अरुण भैरव ने शायद ही इतने सीधे-सादे शब्दों में कभी इतना गहरा दर्द लिखा हो. गाने में एक जगह शेर आता है ‘खत भी लिखे तो उन्हें पहुंचाए किस तरह, अब तो उनका कोई ठिकाना भी नहीं है.’ यह लाइन उस लाचारी को दर्शाती है, जहां एक आशिक अपनी मोहब्बत के लिए तड़प तो रहा है, अपने जज्बात लिखना भी चाहता है, लेकिन वक्त ने दोनों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी है कि अब बातचीत के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं. यह तड़प और बेबसी गाने को और भी ज्यादा भावुक बना देती है.
कैसेट बिक्री के टूटे थे रिकॉर्ड
अल्ताफ राजा के गाने का स्टाइल बेहद अलग था. वे सिर्फ गाते नहीं थे, बल्कि गाने के बीच-बीच में जो शायरी और संवाद बोलते थे, वो सुनने वाले से सीधा कनेक्शन जोड़ लेते थे. उनकी आवाज में एक अजीब सी खनक और वियोग का वो सोंधापन था, जो उस दौर के चमक-दमक वाले पॉप म्यूजिक के बीच भी अपनी अलग पहचान बना गया. जब वे गाते हैं कि ‘मजबूरियों के नाम पर सब छोड़ जाते हैं’ तो ऐसा लगता है जैसे कोई सच्चा दोस्त आपके पास बैठकर आपके टूटे हुए दिल का हाल बयां कर रहा हो. यही वजह थी कि इस गाने ने उस दौर में कैसेट और रिकॉर्ड्स की बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.
देवदास-मजनुओं का ‘नेशनल एंथम’
साल 2000 के शुरुआती दौर में आया यह एलबम भारतीय इंडी-पॉप और गजल-कव्वाली के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है. इस एलबम ने उन लोगों को एक जुबान दी, जो अपने प्यार को मुकम्मल नहीं कर पाए थे. इस गाने की कहानी किसी एक इंसान की नहीं है, यह कहानी है उस हर शख्स की जो आधी रात को तकिए में मुंह छुपाकर रोता है, जो भीड़ में रहकर भी खुद को अकेला पाता है और जो चाहकर भी अपनी पुरानी मोहब्बत की यादों के धुंधलके से बाहर नहीं निकल पाता. यह गाना हमें सिखाता है कि मोहब्बत में सिर्फ मिलना ही सब कुछ नहीं होता. कभी-कभी बिछड़ने का जो दर्द होता है, वह इंसान को अंदर से पूरी तरह बदल देता है. आज भले ही म्यूजिक स्ट्रीमिंग ऐप्स और रील्स का जमाना आ गया हो, लेकिन जब भी दिल के जख्म हरे होते हैं, तो आज की पीढ़ी भी हेडफोन लगाकर अल्ताफ राजा के इसी ‘गम’ में सुकून तलाशती नजर आती है.
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शिखा पाण्डेय पिछले 15 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में एक्टिव हैं. शिखा दिसंबर 2019 से न्यूज 18 हिंदी के साथ हैं और बतौर चीफ सब एडिटर के पद काम कर रही हैं. पिछले 6 सालों से वह एंटरटेनमेंट डेस्क पर काम कर रही …और पढ़ें

