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Most Gorgoneion Dinner For Pahlaj Nihalani: महामारी का वो दौर, अस्पताल का वो अकेला कमरा, जहां न कोई आ सकता था और न कोई जा सकता था… पूरे 28 दिनों तक पहलाज जी वहां जिंदगी और मौत के बीच एक ऐसी जंग लड़ रहे थे, जिसके बारे में डॉक्टरों को भी नहीं पता था कि अंजाम क्या होगा। आखिर उस रात रेस्टोरेंट से आए उस खाने में ऐसा क्या था? क्यों पहलाज निहलानी ने कहा था कि वो उनका ‘आखिरी मील’ हो सकता था? आज उनके जाने के बाद, मौत को मात देने की उनकी यह अनसुनी और रूह कंपा देने वाली दास्तां हर किसी को हैरान कर रही है.

नई दिल्ली. फिल्म इंडस्ट्री गहरे सदमे में है. सिनेमा के पर्दे पर गोविंदा की ‘आंखें’ चमकाने वाले और सेंसर बोर्ड की कुर्सी पर बैठकर पूरी बेबाकी से अपनी बात रखने वाले दिग्गज फिल्ममेकर पहलाज निहलानी अब हमारे बीच नहीं रहे. गुरुवार को वह पंचतत्व में विलीन हो गए. उनके जाने से बॉलीवुड का एक पूरा युग ठहर सा गया है. हर आंख नम है और हर कोई उनके साथ बिताए पलों को याद कर रहा है. लेकिन इस दुखद घड़ी के बीच, पहलाज निहलानी का एक बेहद खौफनाक और पुराना किस्सा लोगों के जहन में फिर से तैरने लगा है. एक ऐसा किस्सा, जब मौत उनके बिस्तर के सिरहाने आकर बैठ गई थी.

पहलाज निहलानी के निधन के इस गमगीन माहौल में उनका वो इंटरव्यू हर किसी को झकझोर रहा है, जिसमें उन्होंने खुद कुबूल किया था कि कैसे वो ‘मौत के मुंह’ से खींचकर वापस लाए गए थे. वो एक ऐसी शाम थी जब सब कुछ सामान्य था, लेकिन अपनों की जिद के आगे झुककर लिया गया एक फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा ‘नाइटमेयर’ बन गया. चिकन का वो एक सिंगल निवाला, जिसने उनके हंसते-खेलते घर में चीख-पुकार मचा दी थी. आधी रात को 3 बजे अचानक कुछ ऐसा हुआ कि उनका पूरा परिवार कांप उठा और उन्हें आनन-फानन में मुंबई के नानावटी अस्पताल भागना पड़ा.

बॉलीवुड हंगामा को दिए एक इंटरव्यू में पहलाज निहलानी ने उस खौफनाक मंजर का जिक्र किया था. उन्होंने कुबूल किया था कि वह ‘मौत के मुंह’ से जिंदा बचकर बाहर आए थे. पहलाज निहलानी हमेशा से ही घर का सादा और शुद्ध खाना पसंद करते थे. बाहर के ताम-झाम और रेस्टोरेंट के तेल-मसालों से वह दूरी बनाकर रखते थे. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.
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उन्होंने बताया था कि उस शाम को उनकी एक फिल्म यूनिट के कुछ सदस्य अचानक उनके घर आ धमके. घर पर अचानक मेहमानों के आने के कारण उतना खाना तैयार नहीं था, जिससे सबका पेट भर सके. ऐसे में पूरी टीम ने तय किया कि क्यों न पास के एक नामी रेस्टोरेंट से खाना ऑर्डर कर लिया जाए. निहलानी ने अपने इंटरव्यू में बताया था कि वह शुरुआत में बाहर से खाना मंगाने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन टीम के लोगों ने काफी जिद की. उन्होंने कहा, ‘मैं नॉन-वेजिटेरियन खाने में सिर्फ चिकन खाता हूं. इसलिए उन लोगों ने मुझसे भी साथ में खाने का बहुत आग्रह किया. उनके मान-सम्मान और शिष्टाचार के नाते मैं मान गया और उनके साथ बैठ गया.’

कहते हैं कि इंसान की छठी इंद्री उसे आने वाले खतरे का अहसास करा देती है. पहलाज निहलानी के साथ भी ऐसा ही हुआ. जैसे ही उन्होंने चिकन का पहला टुकड़ा तोड़ा और मुंह में डाला, उन्हें स्वाद में कुछ गड़बड़ लगी. उन्होंने तुरंत अपनी शंका जाहिर की, लेकिन आस-पास बैठे लोगों ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि खाना बिल्कुल ठीक है और यह सिर्फ उनका वहम है. दूसरों की बात मानकर निहलानी ने अपनी शंका को दरकिनार कर दिया और खाना पूरा कर लिया. यही उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई.

खाना खाने के कुछ ही घंटों बाद निहलानी को पेट में बेचैनी महसूस होने लगी. शुरुआत में उन्हें लगा कि यह मामूली एसिडिटी या बदहजमी का मामला है. एक बार उल्टी होने के बाद वह थोड़ा आराम करने चले गए कि शायद सुबह तक सब ठीक हो जाएगा. लेकिन असली तबाही तो आधी रात को मचने वाली थी.

रात के करीब 3 बजे पहलाज निहलानी की हालत अचानक इतनी ज्यादा बिगड़ गई कि वह तड़प उठे. उन्हें इस बार जो उल्टी हुई, उसमें खाना नहीं बल्कि भारी मात्रा में खून निकला. भारी मात्रा में खून की उल्टी देखकर निहलानी बुरी तरह घबरा गए. उन्होंने बिना वक्त गंवाए तुरंत अपने बेटे को फोन मिलाया, जो गनीमत से उसी बिल्डिंग के दूसरे फ्लोर पर रहता था. परिवार ने बिना एक पल गंवाए मेडिकल इमरजेंसी को कॉल किया और उन्हें नानावटी अस्पताल लेकर भागे. डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें तुरंत आईसीयू में भर्ती कर लिया.

निहलानी उस दौर को याद करते हुए कहा कि यह स्वास्थ्य संकट उस दौर में आया था जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस महामारी की चपेट में थी. अस्पतालों में कड़े नियम लागू थे. पहलाज निहलानी को नानावटी अस्पताल में पूरे 28 दिन गुजारने पड़े. महामारी के प्रतिबंधों के कारण किसी भी बाहरी व्यक्ति या परिवार के सदस्य को उनसे मिलने की अनुमति नहीं थी. उन्होंने भावुक होते हुए बताया था, ‘मैं अगले 28 दिनों तक नानावटी अस्पताल के उस कमरे में कैद था. महामारी की वजह से कोई मुझसे मिलने नहीं आ सकता था. मैं अपनी पत्नी और बच्चों से सिर्फ वीडियो कॉल पर बात कर पाता था. वह समय शारीरिक रूप से जितना थका देने वाला था, मानसिक रूप से उससे कहीं ज्यादा दर्दनाक था.’

पहलाज निहलानी ने अपनी इस नई जिंदगी का पूरा श्रेय नानावटी अस्पताल के डॉक्टर्स और उनकी टीम को दिया था. उन्होंने कहा था, ‘जैसे ही मैं अस्पताल पहुंचा, कुछ ही घंटों के भीतर मेरे सारे जरूरी टेस्ट कर लिए गए और इलाज शुरू हो गया. मैं बहुत भाग्यशाली था. अगर मेरे पास इतना ख्याल रखने वाला परिवार और इतनी मुस्तैद डॉक्टरों की टीम नहीं होती, तो मैं उस रात मर चुका होता.’ इस भयावह अनुभव ने पहलाज निहलानी की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया. उस रात जो भी लोग उस डिनर में शामिल थे, वे सभी बीमार पड़े थे, लेकिन उनकी हालत सबसे ज्यादा गंभीर थी. इस घटना के बाद पहलाज निहलानी ने हमेशा के लिए बाहर के खाने से तौबा कर ली और हर मंच से लोगों को यही सलाह दी ‘बाहर का खाना आपकी जिंदगी का आखिरी भोजन हो सकता है, इसलिए हमेशा घर का बना शुद्ध खाना ही खाएं.’

