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एक वक्त ऐसा भी था, जब मायानगरी मुंबई में सपने देखने की कीमत उसे भूख, अकेलेपन और बेइज्जती से चुकानी पड़ी. रेलवे प्लेटफॉर्म उसकी रातों का ठिकाना बन गया था और डिप्रेशन उसके मन में घर कर चुका था. गोल्ड मेडल लेकर निकला ये शख्स खुद से ही सवाल करने लगा था कि क्या उसके सपनों की कोई कीमत है भी या नहीं. मगर उसने हार मानने के बजाय अपनी जिंदगी को फिल्म की तरह जीना चुना, जहां अंत में हीरो ही जीतता है.वक्त बदला और वही संघर्षों में घिरा लड़का आगे चलकर इंडस्ट्री का ऐसा ‘हीरो’ बना, जिसकी एक्टिंग आज भी लोगों के दिलों पर राज करती है.

नई दिल्ली. मुंबई की चमचमाती फिल्मी दुनिया में कदम रखने वाला वो लड़का कभी सपनों से भरा हुआ था, लेकिन हकीकत ने उसे रेलवे प्लेटफॉर्म तक पहुंचा दिया. रातें खुले आसमान के नीचे बीतीं, जेब खाली थी और दिल में अपमान का बोझ. पढ़ा-लिखा होने के बावजूद हालात ऐसे थे कि खुद पर भरोसा तक डगमगाने लगा. कई बार डिप्रेशन ने घेरा, कई बार लगा कि सब छोड़कर वापस लौट जाना चाहिए. मगर उसी संघर्ष ने उसके अंदर एक ऐसा कलाकार तैयार किया, जिसने बाद में पर्दे पर हर किरदार को जिंदा कर दिया. कभी कॉमेडी से हंसाया, कभी इमोशनल रोल से रुलाया और कभी निगेटिव किरदारों से दहला दिया. आज वह इंडस्ट्री का बड़ा नाम है, लेकिन उसकी कहानी इस बात का सबूत है कि असली हीरो वही होता है, जो टूटकर भी हार नहीं मानता.

आज अनुपम खेर बॉलीवुड के सबसे सम्मानित और अनुभवी कलाकारों में गिने जाते हैं. हिंदी सिनेमा से लेकर हॉलीवुड तक अपनी दमदार एक्टिंग का लोहा मनवा चुके अनुपम खेर ने 500 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. लेकिन उनकी सफलता की कहानी जितनी चमकदार दिखती है, उसका संघर्ष उतना ही दर्दनाक और भावुक कर देने वाला रहा है. हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में एक्टर ने मुंबई में बिताए अपने शुरुआती दिनों को याद किया और बताया कि कैसे उन्हें रेलवे प्लेटफॉर्म पर रातें बितानी पड़ी थीं.

टाइम्स नाऊ को दिए इंटरव्यू में अनुपम खेर ने कहा कि उनका शुरुआती दौर बेहद मुश्किलों भरा था. उन्होंने खुलासा किया कि वह करीब 27 दिनों तक बांद्रा ईस्ट रेलवे प्लेटफॉर्म पर सोए थे. उन्होंने कहा, ‘अपने मुश्किल समय से लड़ने के लिए मैं एक काल्पनिक दुनिया बना लेता था. उस दुनिया में मैं हमेशा जीतने वाला ‘हीरो’ होता था. आखिर में हीरो की जीत होती है, इसलिए मैं अपनी जिंदगी का हीरो था.
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शिमला के एक साधारण परिवार में जन्मे अनुपम खेर ने दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अभिनय की पढ़ाई की थी. वह गोल्ड मेडलिस्ट भी रहे, लेकिन मुंबई पहुंचने के बाद उन्हें संघर्ष की ऐसी जिंदगी मिली, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी. अनुपम खेर ने बताया कि रेलवे प्लेटफॉर्म पर सोना उनके जीवन का सबसे अपमानजनक अनुभव था.

अनुपम खेर ने कहा, ‘मैंने तो सोच लिया था कि अब वापस लौट जाऊंगा. उससे ज्यादा बेइज्जती का एहसास कभी नहीं हुआ. मैं पढ़ा-लिखा आदमी था और शायद इसलिए वो अपमान ज्यादा महसूस होता था.’ एक्टर के मुताबिक उस दौर में आर्थिक तंगी के साथ-साथ मानसिक दबाव भी काफी बढ़ गया था.

71 साल के दिग्गज एक्टर ने यह भी स्वीकार किया कि संघर्ष के दिनों में वह कई बार डिप्रेशन और उदासी से भी जूझे. उन्होंने कहा, ‘ऐसा नहीं था कि मैं डिप्रेस नहीं होता था या मुझे दुख नहीं होता था.’ हालांकि, इन सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने सपनों को जिंदा रखा.

अनुपम खेर ने बताया कि समय के साथ उन्हीं संघर्षों ने उनकी जिंदगी को देखने का नजरिया बदल दिया. उन्होंने कहा, ‘जो चीजें आपकी जिंदगी में नहीं होतीं या जो बुरी चीजें होती हैं, वही कई साल बाद आपकी जिंदगी की कहानियां बन जाती हैं.’ एक्टर आज भी मुश्किल हालात को इसी सोच के साथ देखने की कोशिश करते हैं.

लेकिन अनुपम खेर ने हार नहीं मानी. उनका ब्रेकथ्रू 1984 में महेश भट्ट की फिल्म ‘सारांश’ से आया. मात्र 28 साल की उम्र में उन्होंने 65 साल के शोक संतप्त पिता का रोल बखूबी निभाया. फिल्म में उनका परफॉर्मेंस बेहद सराहा गया और रातोंरात उन्हें इंडस्ट्री का सम्मानजनक एक्टर मान लिया गया. ‘सारांश’ के बाद अनुपम खेर की फिल्में लगातार हिट होती गईं.

‘करमा’, ‘राम लखन’, ‘दिल’, ‘लम्हे’ जैसी फिल्मों में उन्होंने कॉमेडी, नेगेटिव और इमोशनल रोल्स बखूबी निभाए. उनकी वर्सेटाइलिटी उन्हें अलग पहचान दिलाती गई. पिछले चार दशकों में अनुपम खेर ने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई है. हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री में 42 साल पूरे होने पर उन्होंने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट भी शेयर की थी.

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘अगर एक क्लर्क के बेटे के पास सिर्फ 37 रुपये लेकर मुंबई आ सकता है, पहली फिल्म में 28 साल की उम्र में 65 साल के रोल कर सकता है और 42 साल बाद 551 फिल्में कर सकता है, तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है.’ रेलवे प्लेटफॉर्म से लेकर इंटरनेशनल सिनेमा तक का अनुपम खेर का यह सफर सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उम्मीद, आत्मविश्वास और सपनों को जिंदा रखने की मिसाल भी है.

