Protool

चित्रकार का बेटा, 1-2 नहीं जीते थे कुल 12 नेशनल अवॉर्ड, बॉलीवुड में भी बजा डंका, अमिताभ-अजय संग किया था काम

Last Updated:

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि समाज को देखने का नजरिया भी बदल दिया. बंगाली सिनेमा के दिग्गज निर्देशक, लेखक और अभिनेता ऋतुपर्णो घोष ऐसे ही रचनाकारों में शामिल थे. अपनी संवेदनशील कहानियों, गहरी मानवीय समझ और सामाजिक मुद्दों पर बेबाक विजन के कारण उन्होंने भारतीय सिनेमा में एक अलग पहचान बनाई.

नई दिल्ली. ऋतुपर्णो घोष ने महज दो दशक के करियर में न केवल बंगाली सिनेमा को नई दिशा दी, बल्कि उसे नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर नई पहचान भी दिलाई. 31 अगस्त 1963 को कोलकाता के एक सांस्कृतिक और कलात्मक परिवार में जन्मे ऋतुपर्णो घोष का बचपन कला और रचनात्मकता के माहौल में बीता.

उनके पिता सुनील घोष चित्रकार और डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता थे, जबकि उनकी मां भी कला से जुड़ी थीं. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने जाधवपुर विश्वविद्यालय से इकोनॉमिक्स में किया, लेकिन उनका मन नंबर्स और डाटा से ज्यादा इंसानी रिश्तों और भावनाओं को समझने में लगता था.

फिल्मों में कदम रखने से पहले ऋतुपर्णो ने विज्ञापन जगत में अपनी पहचान बनाई. एक कॉपीराइटर के रूप में उन्होंने बंगाली विज्ञापनों की भाषा और शैली को नया आयाम दिया. मशहूर एंटीसेप्टिक क्रीम बोरोलीन के लिए उनका बनाया गया स्लोगन ‘बोंगो जीबोनेर अंगो’ आज भी याद किया जाता है.

Add News18 as
Preferred Source on Google

विज्ञापन के क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने बंगाली मध्यमवर्गीय समाज की सोच, भावनाओं और जीवनशैली को करीब से समझा, जो बाद में उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत बनी. 1990 के दशक की शुरुआत में बंगाली सिनेमा एक कठिन दौर से गुजर रहा था. ऋतुपर्णो घोष ने फिल्मों में उस दौर में कदम रखा था जब गंभीर और सार्थक फिल्मों की जगह कमर्शियल मेलोड्रामा हावी हो चुके थे.

ऐसे समय में ऋतुपर्णो घोष ने 1992 में बच्चों की फिल्म ‘हीरेर अंग्ति’ से निर्देशन की शुरुआत की. हालांकि, उन्हें असली पहचान 1994 में रिलीज हुई ‘उनीशे अप्रैल’ से मिली. मां-बेटी के जटिल रिश्ते पर आधारित इस फिल्म ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों को प्रभावित किया.

फिल्म ‘उनीशे अप्रैल’ ने नेशनल पुरस्कार जीतकर यह साबित कर दिया कि बंगाली सिनेमा में अभी भी गंभीर और संवेदनशील कहानियों के लिए जगह मौजूद है. इसके बाद ऋतुपर्णो घोष ने एक के बाद एक ऐसी फिल्में बनाईं, जिन्होंने समाज के उन पहलुओं को सामने रखा जिन पर अक्सर चर्चा नहीं होती थी.

‘दहन’, ‘असुख’, ‘बाड़ीवाली’ और ‘उत्सव’ जैसी फिल्मों में उन्होंने पारिवारिक रिश्तों, महिलाओं की भावनाओं, सामाजिक पाखंड और मानसिक संघर्षों को बेहद संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा. उनकी फिल्मों की खासियत यह थी कि वे शोर मचाकर नहीं, बल्कि शांत और प्रभावशाली तरीके से दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती थीं.

उन्होंने सिर्फ बंगाली सिनेमा तक खुद को सीमित नहीं रखा. 2004 में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन स्टारर ‘रेनकोट’ और 2007 में अमिताभ बच्चन के साथ ‘द लास्ट लियर’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी सिनेमा में भी अपनी रचनात्मक छाप छोड़ी. अपने करियर के दौरान उन्होंने कुल 12 नेशनल फिल्म पुरस्कार जीते, जो उनकी प्रतिभा और योगदान का प्रमाण हैं.

न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *