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महबूब खान भारतीय सिनेमा के उन महान फिल्मकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने तमाम असफलताओं के बावजूद हार नहीं मानी. गुजरात के एक छोटे गांव से मुंबई पहुंचे महबूब खान ने शुरुआती दिनों में बेहद गरीबी झेली और रेलवे प्लेटफॉर्म पर रातें बिताईं. कई निर्माता उनकी स्क्रिप्ट सुनकर मजाक उड़ाते थे, लेकिन उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी. एक्स्ट्रा कलाकार से शुरुआत करने वाले महबूब खान ने निर्देशन में अपनी अलग पहचान बनाई. ‘अल हिलाल’, ‘औरत’, ‘आन’ और ‘अंदाज’ जैसी फिल्मों के बाद उन्होंने ‘मदर इंडिया’ बनाई, जिसने भारतीय सिनेमा को दुनियाभर में नई पहचान दिलाई.
महबूब खान ने कई यादगार फिल्में बनाई थीं.
नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सबसे महान और विजनरी फिल्ममेकर्स का नाम लिया जाएगा, महबूब खान का जिक्र पूरे सम्मान के साथ होगा. गुजरात के गांव से निकलकर मुंबई के ‘महबूब स्टूडियो’, फिर ऑस्कर के मंच तक पहुंचने का उनका सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. बचपन से ही उन्हें सिनेमा का ऐसा चस्का था कि कई बार वे बिना बताए ट्रेन पकड़कर फिल्में देखने चले जाते थे. जब वे बड़े हुए तो उनके सिर पर हीरो बनने का भूत सवार था, लेकिन उनके इस जुनून से परेशान होकर पिता ने उनकी जमकर पिटाई की और सुधरने के लिए जबरन शादी भी करा दी. वे एक बच्चे के पिता भी बन गए, लेकिन उनके अंदर की आग शांत नहीं हुई. आखिरकार, वे अपनी किस्मत आजमाने दोबारा मुंबई भाग आए. शुरुआती दिनों में उनके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था, इसलिए उन्होंने कई रातें रेलवे प्लेटफॉर्म पर सोकर गुजारीं. वे स्टूडियोज के बाहर घंटों धूप में खड़े रहते, ताकि कोई उन्हें छोटा-मोटा काम दे दे.
मुंबई में महबूब की किस्मत तब पलटी, जब मशहूर फिल्ममेकर अर्देशिर ईरानी की नजर उन पर पड़ी. उन्होंने महबूब खान को फिल्मों में बतौर एक्स्ट्रा कलाकार काम देना शुरू किया. कुछ समय तक छोटे-मोटे रोल करने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनकी असली ताकत कैमरे के सामने एक्टिंग करने में नहीं, बल्कि कैमरे के पीछे रहकर कहानी बुनने और निर्देशन करने में है. उन्होंने अपनी कहानियां लिखनी शुरू कीं और प्रोड्यूसर्स के चक्कर काटने लगे. उस दौर में कई मेकर्स उनकी स्क्रिप्ट सुनकर हंसते थे, उनका मजाक उड़ाते थे और मुंह पर दरवाजा बंद कर देते थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और साल 1935 में उनकी निर्देशित पहली फिल्म ‘अल हिलाल’ रिलीज हुई, जिसे दर्शकों का भरपूर प्यार मिला. इसके बाद, उन्होंने ‘रोटी’, ‘अंदाज’ और ‘आन’ जैसी एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्में दीं. उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सामाजिक मुद्दों को उठाते थे और महिलाओं को बेहद मजबूत और स्वाभिमानी किरदारों में दिखाते थे.
1957 में आया सबसे बड़ा टर्निंग प्वॉइंट
महबूब खान के करियर और भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साल 1957 में आया, जब उन्होंने ‘मदर इंडिया’ जैसी अमर फिल्म बनाई. नरगिस, सुनील दत्त, राजकुमार और राजेंद्र कुमार के दमदार अभिनय से सजी यह फिल्म एक मां के संघर्ष, त्याग और सिद्धांतों की वो बेमिसाल दास्तान थी, जिसने हर देखने वाले की आंखें नम कर दीं. यह फिल्म भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए नॉमिनेट होने वाली पहली फिल्म बनी और भले ही यह महज एक वोट से ऑस्कर चूक गई, लेकिन इसने ग्लोबल स्टेज पर बॉलीवुड को एक नई और मजबूत पहचान दिलाई. महबूब खान ने इंडस्ट्री को न सिर्फ बेहतरीन फिल्में दीं, बल्कि उस दौर में हॉलीवुड जैसी आधुनिक सुविधाओं वाला ‘महबूब स्टूडियो’ भी बनाकर खड़ा किया. 28 मई 1964 को महज 56 साल की उम्र में इस महान फनकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन ‘मदर इंडिया’ जैसी कल्ट फिल्म के जरिए वे हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए.
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अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और पॉल…और पढ़ें

