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साल 1937 में रिलीज हुई भारत की पहली रंगीन फिल्म की कहानी गरीब किसानों के संघर्ष और जमींदारों के शोषण के इर्द-गिर्द बुनी गई थी. हालांकि, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बहुत बड़ी कमर्शियल हिट साबित नहीं हो सकी, लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में इसके महत्व को कभी भुलाया नहीं जा सकता. ब्लैक एंड व्हाइट के दौर में दर्शकों को रंगीन स्क्रीन का जादुई अनुभव देने वाली यह फिल्म एक मील का पत्थर बनी, जिसने भविष्य के सिनेमा के लिए तकनीकी क्रांति के रास्ते खोल दिए.

नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा के इतिहास में दशकों तक पर्दे पर ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों का राज रहा. लेकिन साल 1937 जब देश को अपनी पहली रंगीन फिल्म मिली. जी हां, बंटवारे से पूरे 10 साल पहले ही भारत ने रंगीन फिल्मों की दुनिया में कदम रख दिया था. इस फिल्म का नाम था- किसान कन्या. इसे भारत की पहली पूरी तरह स्वदेशी यानी देश में ही तैयार की गई कलर फीचर फिल्म के तौर पर याद किया जाता है. आर्देशिर ईरानी के प्रोडक्शन में बनी इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया था.

मोती बी. गिडवानी के डायरेक्शन और आर्देशिर ईरानी के प्रोडक्शन में बनी इस फिल्म को सिनेकलर प्रोसेस तकनीक से तैयार किया गया था. ‘किसान कन्या’ का सिनेमाघरों में आना भारतीय सिनेमा के लिए एक बहुत बड़ी तकनीकी क्रांति जैसा था. ऐसा इसलिए क्योंकि उस दौर तक देश में सिर्फ और सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों का ही बोलबाला था और रंगीन स्क्रीन देखना लोगों के लिए एक जादुई अनुभव था.

दिग्गज फिल्ममेकर आर्देशिर ईरानी ‘किसान कन्या’ बनाने से पहले ही भारतीय सिनेमा का एक बड़ा और जाना-माना नाम बन चुके थे. सिनेमा जगत में उन्हें एक क्रांतिकारी के तौर पर देखा जाता था, क्योंकि उन्होंने ही देश की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ बनाई थी. इसके बाद उन्होंने ‘किसान कन्या’ के जरिए भारतीय दर्शकों को रंगीन फिल्मों का तोहफा दिया और इतिहास में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा लिया.
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इस ऐतिहासिक फिल्म में पद्मादेवी, जिल्लो, गुलाम मोहम्मद और निसार जैसे सितारों ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं. हालांकि, आज के दौर की पीढ़ी शायद इन कलाकारों के नामों से उतनी वाकिफ न हो, लेकिन उनके इस शानदार अभिनय और योगदान ने मिलकर भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और यादगार फिल्म की नींव रखी थी, जिसे आज भी सराहा जाता है.

अगर फिल्म की कहानी की बात करें, तो ‘किसान कन्या’ ग्रामीण भारत के इर्द-गिर्द बुनी गई थी. फिल्म में जमींदारों द्वारा गरीब किसानों के शोषण और उनके हक की लड़ाई को बेहद संजीदगी से पर्दे पर उतारा गया था. आजादी से पहले के दौर की बाकी फिल्मों की तरह ही, इस फिल्म में भी समाज की कड़वी सच्चाई और आम इंसान की आर्थिक तंगहाली को गहराई से दिखाया गया था.

इस फिल्म को सिनेकलर तकनीक से बनाया गया था, जो उस दौर में दो रंगों (टू-कलर प्रोसेस) को मिलाकर काम करती थी और दुनियाभर में काफी पॉपुलर थी. हालांकि, उस समय के रंग आज के आधुनिक सिनेमा जितने चटकीले और साफ नहीं होते थे. इसके बावजूद भारतीय दर्शकों के लिए चलते-फिरते किरदारों को पर्दे पर रंग-बिरंगा देखना किसी अजूबे से कम नहीं था और वे इसे देखकर दंग रह गए थे.

भले ही ‘किसान कन्या’ बॉक्स ऑफिस पर कोई बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर या कमर्शियल हिट साबित नहीं हो सकी, लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में इसके महत्व को कभी कम नहीं आंका जा सकता. इस फिल्म ने देश में आगे बनने वाली रंगीन फिल्मों के लिए एक नया रास्ता खोल दिया था. इसी से प्रेरणा लेकर आने वाले दशकों में मेकर्स ने फिल्मों में नए-नए तकनीकी प्रयोग करने की हिम्मत जुटाई.

आज भारतीय फिल्म इंडस्ट्री तकनीकी मामले में दुनिया में बहुत आगे निकल चुकी है, लेकिन इसके बावजूद ‘किसान कन्या’ को आज भी एक मील का पत्थर माना जाता है. इस फिल्म को रिलीज हुए करीब नौ दशक बीत चुके हैं, फिर भी जब-जब बॉलीवुड में तकनीकी क्रांति या किसी बड़े बदलाव का जिक्र होता है, तो इस फिल्म का नाम सबसे पहले सम्मान से लिया जाता है.

