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कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर पैसा कमाती हैं, बल्कि दर्शकों के दिलों पर भी गहरी छाप छोड़ती हैं. 2001 की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ के बाद, जब बॉलीवुड की चुलबुली एक्ट्रेस काजोल ने बड़े पर्दे से लंबा ब्रेक लिया, तो फैंस बेसब्री से उनकी वापसी का इंतजार कर रहे थे. यह इंतजार आज ही के दिन, 26 मई 2006 को खत्म हुआ, जब यशराज फिल्म्स के बैनर तले बनी ‘फना’ थिएटर में रिलीज हुई. कुणाल कोहली के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म सिर्फ एक लव स्टोरी नहीं थी, बल्कि प्यार, देशभक्ति और कड़े फैसलों का ऐसा तूफान थी जिसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए. आज इस फिल्म को रिलीज हुए 20 साल हो गए हैं. आइए इस आइकॉनिक आमिर-काजोल फिल्म की पूरी कहानी जानते हैं.

नई दिल्ली. आज 26 मई बॉलीवुड में एक बहुत ही खास और ऐतिहासिक दिन है. ठीक 20 साल पहले, 2006 में एक ऐसी जोड़ी बड़े पर्दे पर आई थी जिसके लिए थिएटर्स के बाहर लंबी लाइनें लगी थीं. हम बात कर रहे हैं आमिर खान और काजोल की फिल्म ‘फना’ की. यह फिल्म काजोल के करियर में एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुई, क्योंकि शादी और मां बनने के बाद लगभग 5 साल के लंबे गैप के बाद वह सिल्वर स्क्रीन पर लौटीं. फिल्म की कहानी, डायलॉग और म्यूजिक आज भी उतने ही फ्रेश लगते हैं जितने दो दशक पहले लगते थे.

2001 में ‘कभी खुशी कभी गम’ में अंजलि के रोल में दिल जीतने के बाद, काजोल ने फिल्मों से ब्रेक ले लिया था. जब डायरेक्टर कुणाल कोहली ने ‘फना’ की स्क्रिप्ट सुनाई, तो काजोल खुद को रोक नहीं पाईं. फिल्म में उन्होंने ‘जूनी अली बेग’ नाम की एक कश्मीरी लड़की का रोल किया, जो देख नहीं पाती. जूनी के रोल में काजोल ने अपनी आंखों और एक्टिंग के जरिए जो मासूमियत, शांति और उसके बाद का दर्द दिखाया, उसने साबित कर दिया कि वह आज भी बॉलीवुड की नंबर वन एक्ट्रेस क्यों हैं. इस रोल के लिए काजोल को उस साल बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था.

‘फना’ से पहले, आमिर खान और काजोल ने ‘इश्क’ (1997) में साथ काम किया था, लेकिन वहां वे एक-दूसरे के ऑपोजिट नहीं थे. इन दो लेजेंडरी एक्टर्स को पहली बार किसी रोमांटिक-थ्रिलर में एक साथ देखना एक ट्रीट था. फिल्म के पहले हाफ में, आमिर खान ने रेहान कादरी का रोल किया था, जो दिल्ली का एक फ्लर्ट और टूर गाइड है, जो जूनी का दिल कविताओं से जीत लेता है. दिल्ली की हिस्टोरिक इमारतों के बीच शूट किए गए उनके रोमांटिक सीन और कविताएं आज भी मीम्स और रील्स की दुनिया में राज करती हैं.
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फिल्म का पहला हाफ जितना खूबसूरत और रोमांटिक था, इंटरवल के बाद की कहानी उतनी ही डरावनी और सस्पेंस से भरी थी. रेहान कोई आम टूर गाइड नहीं, बल्कि एक इंटरनेशनल टेररिस्ट है जो कश्मीर की आजादी के नाम पर तबाही मचाने निकलता है. बम ब्लास्ट में रेहान की मौत की झूठी खबर के बाद, कहानी कई साल आगे बढ़ जाती है. जूनी की आंख की सर्जरी सफल हो गई है और वह अपने पिता और रेहान के बच्चे के साथ बर्फीले पहाड़ों में रह रही है.

जब रेहान, घायल होकर और अपनी पहचान छिपाकर, जूनी के घर लौटता है, तो दर्शकों की सांसें थम सी जाती हैं. फिल्म का क्लाइमैक्स बॉलीवुड के सबसे दिल दहला देने वाले और रोंगटे खड़े कर देने वाले सीन में से एक माना जाता है, जहां एक औरत (जो अब देख सकती है) को पता चलता है कि उसका पति देश का सबसे बड़ा दुश्मन है और देश की खातिर अपने ही प्रेमी को गोली मार देती है.

प्यार और फर्ज के बीच इस लड़ाई ने थिएटर में दर्शकों को रोने पर मजबूर कर दिया. ‘फना’ की सफलता में गानों और म्यूजिक का अहम रोल था. यह म्यूजिक जोड़ी जतिन-ललित की साथ में आखिरी फिल्म थी.

‘चांद सिफारिश’, ‘मेरे हाथों में’, ‘देखो ना’ और ‘चंदा चमके चम चम’ जैसे गाने आज भी लोगों की प्लेलिस्ट का हिस्सा हैं. इसके अलावा, प्रसून जोशी के गाने और डायलॉग जैसे ‘तेरे दिल में मेरी सांसों को पनाह मिल जाए, तेरे इश्क में मेरी जान फना हो जाए…’ ने फिल्म को कल्ट स्टेटस दिया है.

