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साल 1992 को बॉलीवुड के इतिहास में एक चमत्कारी अध्याय के रूप में याद किया जाता है, जिसने बॉलीवुड के स्थापित समीकरणों को पूरी तरह से उलट दिया. ऐसे समय में जब श्रीदेवी एक महिला सुपरस्टार के रूप में मजबूती से जमी हुई थीं और माधुरी दीक्षित-जूही चावला जैसी अभिनेत्रियां नंबर वन बनने की दौड़ में सबसे आगे थीं, सिर्फ 16-17 साल की एक चुलबुली लड़की ने सीन में एंट्री की. वह नाम था दिव्या भारती. सिर्फ एक साल के अंदर, उन्होंने एक के बाद एक 10 से ज्यादा फिल्में साइन कीं और कई ब्लॉकबस्टर हिट फिल्में दीं, जिससे सफलता का ऐसा तूफान आया कि बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियों के सिंहासन भी हिल गए. उनके बिजली की तरह तेज स्टारडम और बॉक्स ऑफिस पर बेमिसाल दबदबे ने उस जमाने के दिग्गजों को भी हैरान कर दिया.

नई दिल्ली. फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर किसी नए कलाकार को खुद को स्थापित करने और ए-लिस्ट निर्देशकों का ध्यान खींचने में सालों का संघर्ष करना पड़ता है. लेकिन, 1992 में बॉलीवुड ने एक ऐसा चमत्कार देखा जो कभी दोहराया नहीं गया. एक खूबसूरत, चुलबुली और मासूम लड़की स्क्रीन पर आई और सिर्फ एक साल के अंदर 10 से ज्यादा फिल्में दीं. बैक-टू-बैक हिट के साथ, उसने तुरंत नंबर वन स्पॉट पर अपनी दावेदारी पक्की कर ली. यह ऐतिहासिक कामयाबी किसी और ने नहीं बल्कि गुजर चुकीं एक्ट्रेस दिव्या भारती ने हासिल की थी. कहा जाता है कि उस समय दिव्या भारती का क्रेज इतना ज्यादा था कि डिस्ट्रीब्यूटर प्रोड्यूसर पर बिना सोचे-समझे पैसा लगाने का दबाव डालते थे अगर वह किसी फिल्म में होतीं. इस जबरदस्त क्रेज ने उस जमाने की नंबर वन एक्ट्रेस से लेकर उभरती एक्ट्रेस तक, उनके करियर और उनकी फिल्मों की डिमांड पर सीधा असर डाला.

90 के दशक की शुरुआत में श्रीदेवी बॉलीवुड की बिना किसी शक के ‘लेडी सुपरस्टार’ थीं. उनके नाम से फिल्में बिकती थीं और उन्हें मेल एक्टर के बराबर या उससे भी ज्यादा फीस मिलती थी. लेकिन, मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जब दिव्या भारती ने इंडस्ट्री में एंट्री की, तो ट्रेड पंडितों से लेकर आम जनता तक सभी ने उन्हें ‘श्रीदेवी की हमशक्ल’ कहना शुरू कर दिया. दिव्या के फीचर्स, उनके घुंघराले बाल, उनकी आंखें और उनकी कॉमिक टाइमिंग श्रीदेवी से काफी मिलती-जुलती थीं. सबसे बड़ा फायदा यह था कि दिव्या की उम्र उस वक्त सिर्फ 16-17 साल थी, इसलिए उनमें फ्रेशनेस थी.

कुछ ही समय में जो फिल्ममेकर्स श्रीदेवी की बहुत ज्यादा फीस और डेट्स की कमी से परेशान थे, वे उनकी तरफ देखने लगे. अपने कम बजट और बिना किसी नखरे के दिव्या डायरेक्टर्स की पहली पसंद बन गईं. कहा तो ये भी जाता है कि उस वक्त खुद श्रीदेवी भी दिव्या के बिजली की तरह स्टारडम तक पहुंचने से हैरान थीं. यह दिव्या भारती के कद का एक बड़ा उदाहरण था कि उनकी अचानक दुखद मौत के बाद, मेकर्स ने श्रीदेवी को अपनी अधूरी कल्ट फिल्म ‘लाडला’ के लिए साइन किया. श्रीदेवी को पहले शूट किए गए सीन दोबारा शूट करने पड़े, जिसके लिए उन्हें दिव्या का वीडियो फुटेज देखकर उनका स्टाइल कॉपी करना पड़ा.
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90 के दशक में ‘धक-धक गर्ल’ माधुरी दीक्षित सफलता की ऊंचाइयों पर थीं. ‘तेजाब’, ‘दिल’ और ‘बेटा’ जैसी फिल्मों के बाद, वह श्रीदेवी को पीछे छोड़कर नंबर वन की जगह लेने ही वाली थीं कि दिव्या भारती की एंट्री हुई. माधुरी दीक्षित अपनी जबरदस्त डांसिंग स्किल्स के लिए जानी जाती थीं, लेकिन दिव्या भारती ने जिस बोल्डनेस, मासूमियत और एनर्जी के साथ फिल्म ‘विश्वात्मा’ के गाने ‘सात समुंदर पार मैं तेरे पीछे पीछे आ गई’ में डांस किया, उसने पूरे देश के युवाओं को अपना दीवाना बना लिया.

दिव्या भारती सिर्फ रोमांटिक या ग्लैमरस रोल ही नहीं कर रही थीं, बल्कि हर बड़े बैनर की पसंदीदा पसंद बन रही थीं. शाहरुख खान और ऋषि कपूर के साथ ‘दीवाना’ में उनकी एक्टिंग ने यह साफ कर दिया कि वह सिर्फ एक खूबसूरत चेहरा नहीं थीं, बल्कि माधुरी दीक्षित जैसी अनुभवी और जानी-मानी एक्ट्रेस को भी टक्कर दे सकती थीं. उस समय में दिव्या भारती की फिल्में माधुरी की फिल्मों से कहीं ज्यादा अच्छा परफॉर्म कर रही थीं. ‘कयामत से कयामत तक’ के बाद, जूही चावला ने बॉलीवुड में एक चुलबुली, मासूम और मजेदार एक्ट्रेस के तौर पर अपनी जगह बना ली थी. हालांकि, दिव्या भारती के आने से जूही चावला को एक बड़ा झटका लगा. दिव्या भारती नैचुरली चंचल और जिंदादिल थीं और यह उनके ऑन-स्क्रीन किरदारों में साफ दिखता था.

फिल्म ‘शोला और शबनम’ में गोविंदा के साथ दिव्या भारती की कॉमिक और रोमांटिक केमिस्ट्री ने दर्शकों को कुछ समय के लिए जूही चावला को भुला दिया. मेकर्स को साफ पता था कि भारती, जूही चावला के मुकाबले ज्यादा तेजी से थिएटर तक बड़े पैमाने पर ऑडियंस को खींच सकती हैं. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इसलिए कई रोमांटिक-कॉमेडी फिल्में जो जूही चावला को मिलनी थीं, वे सीधे भारती को मिल गईं. जहां 90 के दशक की शुरुआत में जानी-मानी एक्ट्रेस दिव्या से डरती थीं, वहीं भारती पूजा भट्ट, करिश्मा कपूर और काजोल जैसी नई एक्ट्रेस के लिए एक बड़ी रुकावट बन गईं, जो उसी समय अपना डेब्यू कर रही थीं.

पूजा भट्ट ने महेश भट्ट के कैंप में एक मजबूत शुरुआत की थी और करिश्मा कपूर भी लगातार फिल्मों में काम कर रही थीं. हालांकि, दिव्या भारती की मजबूत मौजूदगी के सामने, दोनों एक्ट्रेस को बैनर की मिड-रेंज फिल्मों से ही काम चलाना पड़ा, क्योंकि सभी A-लिस्टर्स दिव्या को पसंद करती थीं. इस बीच, काजोल ने 1992 में ‘बेखुदी’ से डेब्यू किया जो बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही. उस समय, भारती की ‘दीवाना’, ‘शोला और शबनम’ और ‘जान से प्यारा’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा रही थीं. दिव्या की मौजूदगी के कारण, काजोल जैसे नए टैलेंट को जरूरी लाइमलाइट और बड़े प्रोजेक्ट्स नहीं मिल पा रहे थे.

