Last Updated:
‘देवदास, पारो और चंद्रमुखी’ भारतीय सिनेमा की यह त्रिकोणीय प्रेम कहानी दशकों से दर्शकों के दिलों पर राज कर रही है. ‘कौन कमबख्त बर्दाश्त करने को पीता है’ जैसा संवाद आज भी फिल्म प्रेमियों की जुबान पर रहता है. दिलीप कुमार और शाहरुख खान ने इस किरदार को अपनी अदाकारी से नई ऊंचाइयां दीं, लेकिन ‘देवदास’ की सिनेमाई यात्रा इन सितारों से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी. दिलचस्प बात यह है कि एक दूरदर्शी फिल्मकार ने उस दौर में, जब भारतीय सिनेमा अभी अपने शुरुआती कदम रख रहा था, इस कहानी को एक नहीं बल्कि तीन बार बड़े पर्दे पर उतारा और ऐसा इतिहास रचा, जिसकी चर्चा आज भी होती है.

नई दिल्ली. ‘कौन कमबख्त बर्दाश्त करने को पीता है, हम तो पीते हैं कि यहां बैठ सकें…’ और ‘कहां थी तुम पारो?ट जैसे संवाद आज भी ‘देवदास’ का नाम सुनते ही लोगों के जहन में गूंज उठते हैं. प्रेम, विरह, त्याग और आत्मविनाश की यह कहानी भारतीय सिनेमा की सबसे चर्चित प्रेम गाथाओं में गिनी जाती है. जब भी ‘देवदास’ की बात होती है, अधिकतर लोगों को दिलीप कुमार या शाहरुख खान का चेहरा याद आता है, जिन्होंने अपने-अपने दौर में इस किरदार को अमर बना दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन दोनों सितारों से बहुत पहले एक फिल्मकार ने इस दर्दभरी कहानी की ताकत को पहचान लिया था? इतना ही नहीं, उसने एक बार नहीं बल्कि तीन अलग-अलग भाषाओं में ‘देवदास’ को पर्दे पर उतारकर इतिहास रच दिया था. भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में किया गया यह प्रयोग इतना बड़ा था कि आज भी फिल्म इतिहास में उसकी मिसाल दी जाती है.

दिलीप कुमार और शाहरुख खान इन दोनों सुपरस्टार्स से दशकों पहले एक ऐसे फिल्मकार थे, जिन्होंने न केवल ‘देवदास’ को पर्दे पर उतारा, बल्कि एक ही कहानी को तीन अलग-अलग भाषाओं में फिल्माया और भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी? उनका नाम था प्रमथेश चंद्र बरुआ.

प्रमथेश चंद्र बड़ुआ का जन्म आज के असम के गौरीपुर के रॉयल परिवार में हुआ था. शाही ठाट-बाट के बीच पले-बढ़े इस युवा राजकुमार ने राजसी जीवन को ठुकरा कर सिनेमा का रास्ता चुना. 1920-30 के दशक में एक रईस का फिल्मों में आना न सिर्फ साहसिक था, बल्कि समाज के लिए हैरानी की बात भी. लेकिन बड़ुआ ने अपने जुनून को हावी होने दिया और जल्द ही वे भारतीय सिनेमा के सबसे शुरुआती सुपरस्टार और दूरदर्शी निर्देशक बन गए.
Add News18 as
Preferred Source on Google

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘देवदास’ को पहली बार पूरी शिद्दत से पर्दे पर उतारने का श्रेय प्रमथेश बड़ुआ को ही जाता है. 1935 में बरुआ ने बंगाली भाषा में ‘देवदास’ फिल्म बनाई, जिसमें उन्होंने खुद देवदास का रोल प्ले किया. अगले ही साल 1936 में उन्होंने हिंदी वर्जन बनाया, जिसमें के.एल. सहगल ने मुख्य भूमिका निभाई. सहगल की मेलानकॉली आवाज और स्क्रीन प्रेजेंस ने फिल्म को अमर बना दिया. बाद में उन्होंने असमिया वर्जन से भी इस कहानी को जोड़ा. इस तरह बरुआ ने ‘देवदास’ को पूरे भारत तक पहुंचाया और इसे क्षेत्रीय भाषाओं का सिनेमाई पुल बनाया.

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘देवदास’ को पहली बार पूरी शिद्दत से पर्दे पर उतारने का श्रेय प्रमथेश बड़ुआ को ही जाता है. 1935 में बरुआ ने बंगाली भाषा में ‘देवदास’ फिल्म बनाई, जिसमें उन्होंने खुद देवदास का रोल प्ले किया. अगले ही साल 1936 में उन्होंने हिंदी वर्जन बनाया, जिसमें के.एल. सहगल ने मुख्य भूमिका निभाई. सहगल की मेलानकॉली आवाज और स्क्रीन प्रेजेंस ने फिल्म को अमर बना दिया. बाद में उन्होंने असमिया वर्जन से भी इस कहानी को जोड़ा. इस तरह बरुआ ने ‘देवदास’ को पूरे भारत तक पहुंचाया और इसे क्षेत्रीय भाषाओं का सिनेमाई पुल बनाया.

‘देवदास’ के अलावा बरुआ ने ‘मुक्ति’, ‘रजत जयंती’ और ‘अधिकार’ जैसी चर्चित फिल्मों का निर्देशन और अभिनय किया. उनकी फिल्मों ने बंगाली सिनेमा को नई ऊंचाई दी और शुरुआती हिंदी फिल्ममेकिंग पर भी गहरा असर डाला.

स्क्रीन पर जितनी गहराई बरुआ दिखाते थे, उनकी असल जिंदगी भी उतनी ही ट्रेजिक रही. शराब की लत और स्वास्थ्य की गिरावट ने उनके आखिरी सालों को प्रभावित किया. कई लोग मानते हैं कि उनकी जिंदगी उनके फिल्मी किरदारों से काफी मिलती-जुलती थी. प्रमतेश चंद्र बरुआ को भारतीय सिनेमा का प्रारंभिक पायनियर माना जाता है. उन्होंने भावनात्मक गहराई, रियलिस्टिक परफॉर्मेंस और तकनीकी नवाचार के जरिए सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन से आगे ले जाकर कला का दर्जा दिया. आज भी उनकी ‘देवदास’ को क्लासिक का दर्जा हासिल है.

बरुआ की अपनी जिंदगी भी किसी फिल्मी दुखांत से कम नहीं थी. शराब के लगातार बढ़ते सेवन और बिगड़ती सेहत ने उनके आखिरी दिन बेहद कठिन बना दिए. 1951 में मात्र 48 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. कहा जाता है कि देवदास की तरह ही उनके भीतर भी एक टूटा हुआ आदमी रहता था, जिसने बहुत कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह दिया.

