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भारतीय सिनेमा में कई मेल एक्टर्स ने महिला या ट्रांसजेंडर किरदार निभाए हैं, लेकिन इतिहास में सिर्फ एक ही भारतीय पुरुष एक्टस ऐसा हुआ, जिसने इंटरनेशनल स्तर पर ‘बेस्ट एक्ट्रेस’ का अवॉर्ड जीता. यह उपलब्धि आज भी बेहद अनोखी मानी जाती है. खास बात यह है कि जिस फिल्म के लिए उन्हें यह सम्मान मिला, वही फिल्म भारत में कभी ठीक से रिलीज नहीं हो पाई.

नई दिल्ली. ‘चाची 420’ में कमल हासन से लेकर ‘लक्ष्मी’ में अक्षय कुमार तक स्क्रीन पर कई बॉलीवुड सेलेब्स ने अपनी अदाकारी से लोगों को दंग किया. लेकिन, इनमें से केवल एक भारतीय पुरुष अभिनेता ऐसा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘सर्वश्रेष्ठ एक्ट्रेस’ का पुरस्कार मिला. खास बात यह है कि जिस फिल्म के लिए उन्हें यह सम्मान मिला, वही फिल्म भारत में कभी ठीक से रिलीज नहीं हो पाई.

वह नाम है-निर्मल पाण्डेय की, जिन्होंने 1996 में आई फिल्म ‘दायरा’ में ऐसा किरदार निभाया, जिसने भारतीय सिनेमा में जेंडर और पहचान को लेकर नई बहस छेड़ दी थी. फिल्म का निर्देशन दिग्गज अभिनेता-निर्देशक अमोल पालेकर ने किया था.

फिल्म ‘दायरा’ अपने समय से काफी आगे मानी जाती है. इसमें जेंडर आइडेंटिटी, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, मानसिक आघात और समाज के पूर्वाग्रह जैसे संवेदनशील विषयों को बेहद गहराई से दिखाया गया था. फिल्म में निर्मल पाण्डेय ने एक ट्रांसजेंडर कलाकार का किरदार निभाया था, जो यौन हिंसा का शिकार हुई एक महिला के करीब आता है. इस महिला का रोल सोनाली कुलकर्णी ने निभाया था.
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दोनों कलाकारों की परफॉर्मेंस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त सराहना मिली. 1997 में फ्रांस के वैलेंसिएन्स इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ एक्शन एंड एडवेंचर फिल्म्स में जूरी ने फैसला सुनाया और निर्मल पाण्डेय और सोनाली कुलकर्णी दोनों को संयुक्त रूप से ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री’ का पुरस्कार दिया जाएगा. जी हां, निर्मल पांडेय सह-विजेता थे.

इसी के साथ निर्मल पांडे इंटरनेशनल बेस्ट एक्ट्रेस सम्मान जीतने वाले पहले और अब तक के इकलौते भारतीय पुरुष अभिनेता बन गए. इस अनोखी उपलब्धि को बाद में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया. हालांकि, विदेशों में तारीफें बटोरने वाली यह फिल्म भारत में मुश्किलों में घिर गई.

उस दौर में समलैंगिकता, जेंडर फ्लूइडिटी और यौन हिंसा जैसे मुद्दों पर खुलकर बात करना बेहद साहसिक माना जाता था. रिपोर्ट्स के मुताबिक, सेंसर बोर्ड को फिल्म के कई संवाद और सीन आपत्तिजनक लगे थे. काफी कट्स और बदलावों के बाद फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट तो मिला, लेकिन इसे देशभर में सही तरीके से थिएटर रिलीज नहीं मिल सकी. समय के साथ दायरा को कल्ट फिल्म का दर्जा मिला और आज इसे भारतीय सिनेमा की उन शुरुआती फिल्मों में गिना जाता है, जिन्होंने क्वीर और जेंडर पहचान को संवेदनशीलता के साथ पेश किया.

निर्मल पाण्डेय का जन्म 1962 में राजस्थान में हुआ था. उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग की पढ़ाई की और बाद में लंदन में थिएटर भी किया. फिल्मों में उनकी शुरुआत बैंडिट क्वीन से हुई, जिसमें उन्होंने विक्रम मल्लाह का किरदार निभाया था. निर्मल अपने दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और अलग तरह के किरदारों के लिए जाने गए. उन्होंने औज़ार, प्यार किया तो डरना क्या और वन 2 का 4 जैसी फिल्मों में यादगार निगेटिव भूमिकाएं निभाईं. वहीं, में उन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग भी दिखाई.

साल 2010 में 47 साल की उम्र में हार्ट अटैक के कारण उनका निधन हो गया. उनके अचानक चले जाने से फिल्म इंडस्ट्री को बड़ा झटका लगा. उनकी आखिरी फिल्म ‘लाहौर’ उनके निधन के बाद रिलीज हुई और उसे समीक्षकों से काफी सराहना मिली.

निर्मल पाण्डेय उन अभिनेताओं में से थे, जो मुख्यधारा के हीरो बनने के बजाय अलग और चुनौतीपूर्ण रोल चुनते थे. ‘दायरा’ जैसी फिल्म उनके करियर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बनी, जो आज भी प्रगतिशील सिनेमा की मिसाल मानी जाती है. आज जब ट्रांसजेंडर किरदारों और जेंडर आइडेंटिटी पर फिल्में बन रही हैं, तब ‘दायरा’ और निर्मल पांडे की परफॉर्मेंस को नए सिरे से याद किया जा रहा है. उन्होंने साबित किया कि एक्टिंग लिंग की सीमाओं से परे होती है.

