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कभी आशिकों का सहारा, कभी टूटे दिलों का मरहम, 1973 का ब्लॉकबस्टर गाना, किशोर कुमार की ये ‘अनोखी अदा’ आज भी हिट

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पुराने दौर के कई गाने ऐसे हैं, जो सालों बाद आज भी गुनगुनाए जाते हैं. उस दौर के गानों को आज भी लोग सिर्फ सुनते नहीं हैं. बल्कि उनके साथ जीते हैं. कुछ गीतों की
हर लाइन किसी टूटे हुए दिल की कहानी बन जाती थी और हर धुन किसी अधूरी मोहब्बत का सहारा. आज बात कर रहे हैं 1973 के उस ब्लॉकबस्टर गाने की, जिसमें किशोर कुमार का वो ‘अनोखी अदा’ दिखी, जो लोगों को आज भी गुनगुनाने को मजबूर कर देती है.

कभी आशिकों का सहारा, कभी टूटे दिलों का मरहम, 1973 का ब्लॉकबस्टर गानाZoom

नई दिल्ली. ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’, ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं’, ‘ये शाम मस्तानी, मदहोश किए जाए’, ‘अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं’ ये सिर्फ कुछ पंक्तियां नहीं, बल्कि 1970 के दशक की उस भावनात्मक दुनिया की झलक हैं, जहां हर गीत आशिकों का सहारा तो कभी टूटे दिलों के लिए मरहम का काम करता था. संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जज्बातों का आईना रहा है. कभी बिछड़ते प्यार का दर्द, तो कभी अधूरी मोहब्बत की सुकून भरी यादें. कभी मुकेश के दुखद गीत तो किशोर कुमार के वो रोमांटिक गीत जो पुरानी भारी चाहत में इश्क का नया रंग भर दें. वहीं, मोहम्मद रफी के क्लासिक्स की सादगी और लता मंगेशकर के सदाबहार गानों की मधुरता से हर दर्द को एक प्यारी राहत में बदल जाती है. 70 का दशक एक ऐसा स्वर्णिम काल था, जिसने हिंदी संगीत को ऐसी अमर धुनें दीं जो पीढ़ियों की सीमाओं को लांघकर आज भी हमारे दिलों में जिंदा हैं.

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Shikha Pandey

शिखा पाण्डेय पिछले 15 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में एक्टिव हैं. शिखा दिसंबर 2019 से न्यूज 18 हिंदी के साथ हैं और बतौर चीफ सब एडिटर के पद काम कर रही हैं. पिछले 6 सालों से वह एंटरटेनमेंट डेस्क पर काम कर रही …और पढ़ें

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