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लंबा कद, भारी आवाज, आंखों में गुस्सा और जुबान पर ऐसा अंदाज कि सामने वाला चुप हो जाए. बॉलीवुड में जब रोमांटिक हीरो का दौर था, तब एक ऐसा लड़का एक्टर बनने आया, जिसने हीरो बनने से पहले विलेन बनकर ही दर्शकों का दिल जीत लिया. शुरुआत में लोग कहते थे कि इसका चेहरा हीरो जैसा नहीं है, लेकिन स्क्रीन पर आते ही वही शख्स बड़े-बड़े सुपरस्टार्स पर भारी पड़ने लगा. हालत ये हो गई कि सिनेमाघरों में लोग हीरो से ज्यादा उस विलेन के डायलॉग पर सीटियां बजाने लगे. फिर एक दिन डिस्ट्रिब्यूटर्स ने मेकर्स से साफ कह दिया- ‘इसे हीरो बनाओ, जनता इसी को देखना चाहती है.’ इसके बाद शुरू हुआ ऐसा सफर, जिसने अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना जैसे सितारों को भी कड़ी टक्कर दी.

नई दिल्ली. एक जमाना था, जब हिंदी सिनेमा में दो किस्म के लोग होते थे- एक तो वो, जिनके कारण हीरो को मारने की साजिश रची जाती थी और दूसरे, जो साजिश रचते थे. बॉलीवुड में 1970 के दशक में जब एक्शन और डायलॉगबाजी का बोलबाला था, तब एक ऐसा अभिनेता आया जिसकी आवाज में गड़गड़ाहट थी, नजरों में आग थी और स्टाइल में बेपनाह आक्रामकता थी. शुरू में इस एक्टर को खलनायक के रोल मिले, जहां वह स्क्रीन पर आते ही दर्शकों को डरा देता. लेकिन जल्दी ही उसने साबित कर दिया कि वह सिर्फ विलेन नहीं, बल्कि हीरो भी बन सकता है. उसने अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना जैसी दिग्गज हस्तियों से सीधी टक्कर ली. डिस्ट्रिब्यूटर्स ने उसे हीरो बनाया तो उसने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया. उसके अंदर वो काबिलियत थी कि सिर्फ एक शब्द से पूरी इंडस्ट्री को सन्नाटे में डाल देता था.

ये और कोई नहीं बल्कि आज हम बात कर रहे हैं उसी ‘बिहारी बबुआ’ यानी शत्रुघ्न सिन्हा की, जिन्होंने न सिर्फ बॉलीवुड बल्कि सियासत पर भी अपनी आवाज का झंडा गाड़े. 9 दिसंबर 1945, बिहार के पटना जिले में एक ऐसा लड़का पैदा हुआ, जिसकी आवाज गरजती थी और आंखें दहलाने वाली. शत्रुघ्न सिन्हा का नाम उस वक्त के मशहूर महाकाव्य ‘रामायण’ के वीर योद्धा से लिया गया था. पर इस शत्रुघ्न ने फिल्मों में शुरुआत विलेन से की.

फिल्म इंस्टीट्यूट (FTII) से पढ़ाई करने के बाद 1969 में ‘सजन’ से उनका डेब्यू हुआ, लेकिन फिल्म फ्लॉप रही. फिल्म नहीं चली तो निर्माताओं ने उन्हें ‘ढंग से काम नहीं दे सकते’ का लेबल लगा दिया. शुरुआती दिनों में उन्होंने विलेन और सपोर्टिंग रोल किए. प्यार ही प्यार, रामपुर का लक्ष्मण, ब्लैकमेल, हीरा जैसी फिल्मों में उनके खूंखार विलेन रोल्स ने उन्हें ‘वंडर विलेन’ का टैग दिलाया. उनकी गहरी आवाज, तेज नजर और बोल्ड स्टाइल उन्हें दूसरों से अलग करती थी.
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1970 के शुरुआती सालों में शत्रुघ्न को लीड हीरो के रूप में कई फिल्में मिलीं, लेकिन 1970-75 तक ज्यादातर फिल्में हिट नहीं हुईं. फिर 1976 में आया टर्निंग पॉइंट, सुभाष घई की फिल्म ‘कालीचरण’. इस फिल्म ने उन्हें सुपरस्टार बना दिया. फिल्म सुपरहिट रही और शत्रुघ्न सिन्हा को लीड हीरो के रूप में स्थापित कर दिया. इसके बाद उनका सफर आसमान छूने लगा.

1970 के दशक में बॉलीवुड पर दो नामों का सिक्का चलता था वो नाम थे अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना. उनके आगे खलनायक खड़े होते तो दबंग बनते, लेकिन गिर जाते. शत्रुघ्न ने दोनों को मात दी. 1970 के अंत और 80 के दशक में शत्रुघ्न सिन्हा, अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के साथ टॉप हीरो में गिने जाते थे. काला पत्थर, दोस्ताना, नसीब, क्रांति, शान जैसी फिल्मों में उन्होंने अमिताभ के साथ स्क्रीन शेयर किया. दोनों के बीच कथित राइवलरी की खूब चर्चाएं थीं.

शत्रुघ्न ने अपनी आत्मकथा एनीथिंग बट खामोश में लिखा कि अमिताभ को कभी-कभी उनकी लोकप्रियता से दिक्कत होती थी। लेकिन बाद में दोनों ने गलतफहमी दूर कर लीं और अब अच्छे दोस्त हैं. शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी अलग फैन फॉलोइंग बना ली. कई बार उनका स्क्रीन प्रेजेंस इतना मजबूत होता था कि दर्शकों की नजरें उन्हीं पर टिक जाती थी. एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद बताया कि कैसे वो विलेन से हीरो बने.

उन्होंने बताया था कि लोगों को विलेन को रूप में उनका अंदाज काफी पसंद आया. डिस्टीब्यूटर्स ने ये भाप लिया. लोग सिनेमाघरों में हीरो के डायलॉग्स पर इतनी तालियां नहीं बजाते थे जितने मेरे डायलॉग्स पर… बस फिर क्या था. डिस्टीब्यूटर्स ने मेकर्स को कह दिया कि इसको हीरो बनाओ. मेकर्स ने डिस्टीब्यूटर्स की बात को समझा और मुझे मौका दिया, जिसमें मैं सफल रहा.

हालांकि, उनका करियर विवादों से भी अछूता नहीं रहा. बेबाक बोलने की आदत की वजह से वे अक्सर चर्चा में रहते थे. इंडस्ट्री में उनके कई किस्से मशहूर रहे, लेकिन उन्होंने कभी अपनी अलग पहचान छोड़ने की कोशिश नहीं की. फिल्मों के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और बीजेपी से जुड़कर सांसद बने. बाद में वे दूसरे राजनीतिक दलों से भी जुड़े और सक्रिय राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखी. फिलहाल वो कांग्रेस में हैं और पटना साहिब से सांसद हैं.

