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इस परमसुंदरी का सपना कभी डॉक्टर बनने का था. फिल्मों में आने का उनका कोई सपना नहीं था. कहा जाता है कि मां की जिद पर उन्होंने मजबूरी में स्क्रीन टेस्ट दिया था. उम्मीद थी कि उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाएगा, लेकिन उनकी मासूम अदाकारी ने निर्देशक को इतना प्रभावित किया कि उन्हें तुरंत फिल्म मिल गई. इसके बाद इस हसीना ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. एक के बाद एक हिट फिल्मों से उन्होंने भारतीय सिनेमा में ऐसा इतिहास रचा, जानते हैं वो हसीना कौन थी?

नई दिल्ली. डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली एक लड़की को फिल्मों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन मां की जिद के आगे उसकी एक न चली. बेमन से वह स्क्रीन टेस्ट देने पहुंची थी, क्योंकि उसे पूरा भरोसा था कि उसे रिजेक्ट कर दिया जाएगा. मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कैमरे के सामने आते ही उस लड़की ने ऐसा असर छोड़ा कि निर्देशक ने तुरंत उसे अपनी फिल्म की हीरोइन बना दिया. यही लड़की आगे चलकर भारतीय सिनेमा की सबसे महान अभिनेत्रियों में गिनी गई. अपनी मासूमियत, दमदार अभिनय और भावनात्मक किरदारों से उन्होंने लाखों दिलों पर राज किया. ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्म से इतिहास रचने वाली नरगिस ने सिर्फ स्टारडम ही नहीं पाया, बल्कि भारतीय सिनेमा को दुनिया भर में नई पहचान भी दिलाई.

भारतीय सिनेमा जगत की चुलबुली, सुंदर और दमदार अभिनेत्री का जिक्र हो तो भला ‘मदर इंडिया’ को कैसे भूला जा सकता है. भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग में अपनी अभिनय प्रतिभा से लाखों दिल जीतने वाली अभिनेत्री के बारे में कम ही लोग जानते हैं कि नरगिस अभिनेत्री नहीं, बल्कि डॉक्टर बनना चाहती थीं. मां की जिद पर उन्हें अभिनय की दुनिया में कदम रखना पड़ा और बेमन से दिए गए स्क्रीन टेस्ट ने ही उनकी किस्मत बदल दी.

नरगिस ने अभिनय के अलावा समाज सेवा में भी योगदान दिया. उन्होंने सुनील दत्त से शादी की और राजनीति में भी सक्रिय रहीं. नरगिस दत्त एक बेहतरीन अभिनेत्री होने के साथ-साथ सशक्त महिला भी थीं. डॉक्टर बनने का उनका सपना मां की जिद के आगे झुक गया, लेकिन उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में जो कमाल किया, वह आज भी याद किया जाता है. 3 मई को उनकी पुण्यतिथि है.
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नरगिस दत्त का असली नाम रशीद फातिमा था. उनका जन्म 1 जून 1929 को कोलकाता में हुआ था. उनकी मां जदनबाई उस समय की प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका, नृत्यांगना, निर्देशक और अभिनेत्री थीं. जदनबाई भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार भी थीं. वे चाहती थीं कि उनकी बेटी अभिनय की दुनिया में आए, लेकिन नरगिस का सपना कुछ और था. वे डॉक्टर बनना चाहती थीं. साल 1935 में जब नरगिस मात्र 6 वर्ष की थीं, तब जदनबाई ने उन्हें बाल कलाकार के रूप में फिल्म ‘तलाश-ए-हक’ में उतार दिया. इस तरह उनके अभिनय की शुरुआत हो गई, लेकिन नरगिस का मन अभिनय में नहीं था.

एक दिन जदनबाई ने उन्हें महबूब खान के पास स्क्रीन टेस्ट के लिए भेज दिया. नरगिस बिल्कुल बेमन से टेस्ट देने गई थीं. उनका इरादा था कि महबूब खान उन्हें रिजेक्ट कर देंगे और वे डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर सकेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. महबूब खान उनकी एक्टिंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी फिल्म ‘तकदीर’ के लिए नरगिस को नायिका चुन लिया.

इसके बाद साल 1945 में महबूब खान की फिल्म ‘हुमायूं’ आई लेकिन असली सफलता साल 1949 में मिली. राज कपूर की फिल्म ‘बरसात’ और दिलीप कुमार के साथ ‘अंदाज’ ने नरगिस को स्टार बना दिया. ‘बरसात’ में राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों को बहुत पसंद आई.

नरगिस का करियर चरम पर था, लेकिन 1950 के बाद कुछ फिल्में असफल रहीं. फिर 1957 में महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ आई. इस फिल्म में नरगिस ने राधा का किरदार निभाया और इतिहास रच दिया. ‘मदर इंडिया’ को ऑस्कर के लिए नामांकन भी मिला. इस फिल्म ने नरगिस को अंतरराष्ट्रीय स्तर की पहचान दिलाई. राज कपूर के साथ नरगिस की जोड़ी बेहद मशहूर हुई. ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘चोरी चोरी’, ‘जागते रहो’ जैसी फिल्मों में दोनों ने साथ काम किया. इन फिल्मों के गाने आज भी लोगों के दिलों में बसते हैं.

