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बॉलीवुड के इतिहास में कई स्टार्स आए और गए, लेकिन राज कुमार जैसी पर्सनैलिटी न कभी हुई और न कभी होगी. वह एक एक मिजाज के एक्टर थे. कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे कुलभूषण पंडित, जिन्हें दुनिया राज कुमार के नाम से जानती है, मुंबई पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे. लेकिन किस्मत उन्हें सिल्वर स्क्रीन पर ले आई और वहां उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, वह आज भी मिसाल है. उनकी सबसे खास बात उनका स्वैग और बेहतरीन डायलॉग डिलीवरी थी. वह किसी भी फिल्म में होते थे, दर्शक उनके साथ होते थे.

नई दिल्ली. राज कुमार के करियर की सबसे बड़ी कामयाबी यह मानी जाती है कि उन्होंने दो बार बॉलीवुड के सबसे बड़े एक्टर दिलीप कुमार का पर्दे पर सामना किया और दोनों ही बार वह उन पर भारी पड़े. पहली बार 1959 में फिल्म ‘पैगाम’ में और ठीक 32 साल बाद 1991 में ‘सौदागर’ में. सुभाष घई की फिल्म ‘सौदागर’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि दो लोगों के बीच की लड़ाई थी. दिलीप और राज कुमार की वीर सिंह और राजेश्वर सिंह के रोल ने थिएटर में आग लगा दी थी. एक ऐसे दौर में जहां फिल्में गानों और रोमांस से चलती थीं, ‘सौदागर’ सिर्फ डायलॉग और इन दो दिग्गज स्टार्स के बीच कड़ी टक्कर के दम पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी.

साल 1991 बॉलीवुड के लिए एक बड़ा बदलाव लाने वाला साल था. आमिर खान ‘दिल है कि मानता नहीं’ जैसी फिल्मों से यूथ आइकन बन गए थे और सलमान खान ‘साजन’ और ‘पत्थर के फूल’ जैसी फिल्मों से यूथ आइकन बन गए थे. ऐसा माना जाता था कि पुराने एक्टर्स का दौर खत्म हो गया है, लेकिन जब अगस्त 1991 में ‘सौदागर’ रिलीज हुई, तो इसने पूरे बॉक्स ऑफिस इक्वेशन को बदल दिया.

‘सौदागर’ ने उस साल बॉक्स ऑफिस पर सलमान खान की ‘पत्थर के फूल’ और आमिर खान की ‘दिल है कि मानता नहीं’ दोनों से ज्यादा कमाई की. उस समय की ट्रेड रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘सौदागर’ साल की दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई. राज कुमार ने दिखाया कि भले ही उनकी उम्र बढ़ रही हो, लेकिन उनका स्टारडम और दर्शकों को लुभाने की ताकत किसी भी युवा सुपरस्टार से बेजोड़ है.
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कम ही लोग जानते हैं कि 80 के दशक में, जब अमिताभ बच्चन का राज था और मिथुन चक्रवर्ती का डिस्को का दौर जोरों पर था, तब राज कुमार चुपचाप अपनी फिल्में हिट करवा रहे थे. ‘धर्म कांटा’, ‘राज तिलक’, ‘मरते दम तक’ और ‘जंग बाज’ जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर बहुत अच्छा परफॉर्म किया और एक ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ के रूप में फिल्में करते चले गए. उन्होंने अपनी शर्तों पर काम किया और अक्सर डायरेक्टर्स को उनकी स्क्रिप्ट्स के बारे में चैलेंज किया.

90 के दशक में भी डायरेक्टर्स राज कुमार को पसंद करते थे, जो जानते थे कि ‘जानी’ की एक लाइन भी फिल्म को हिट करा सकती है. राज कुमार का स्टारडम सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं था. उनके किस्से आज भी बॉलीवुड में सुनाए जाते हैं. चाहे गोविंदा की शर्ट से रूमाल बनाना हो या सलमान खान से कहना कि ‘अपने पिता से पूछो कि मैं कौन हूं’.

राज कुमार ने कभी अपनी सेल्फ-रिस्पेक्ट से कॉम्प्रोमाइज नहीं किया. इसलिए जब वे 1991 में स्क्रीन पर आए, तो ऑडियंस किसी खान के लिए नहीं, बल्कि उस ‘रॉयल’ आवाज को सुनने के लिए थिएटर्स में उमड़ पड़ी.

राज कुमार 1996 में गुजर गए, लेकिन उनका असर आज भी है. वे एक ऐसे एक्टर थे जिन्होंने तीन दशकों तक अपना करिश्मा बनाए रखा. 90 के दशक की खान स्टॉर्म के बीच भी, ‘सौदागर’ से राज कुमार ने साबित कर दिया कि कंटेंट और दमदार परफॉर्मेंस का कोई सब्स्टीट्यूट नहीं है. वे बॉलीवुड के असली ‘किंग’ थे, जिन्होंने अपना खुद का किंगडम बनाया और अपनी शर्तों पर उस पर राज किया.

