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7 जून 2002 की तारीख बॉलीवुड के इतिहास में एक अनोखे और बहुत कम मिलने वाले इत्तेफाक के लिए दर्ज है. यह वह दिन था जब बॉक्स ऑफिस पर ‘क्रांति’ का बिगुल बजा था, जिससे दर्शक उलझन में पड़ गए. एक ही महान योद्धा शहीद भगत सिंह के जीवन पर बनी दो बड़ी फिल्में ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ और ’23 मार्च 1931: शहीद’ एक ही समय में थिएटर में रिलीज हुईं. जहां सनी देओल और बॉबी देओल की भाईचारे वाली जोड़ी ने इमोशनल पंच दिया, वहीं अजय देवगन ने अपनी जबरदस्त परफॉर्मेंस से मुकाबले में पूरी तरह से अपना दबदबा बना लिया. यह टक्कर सिर्फ 2 फिल्मों के बीच नहीं थी, बल्कि भगत सिंह को लेकर दो अलग-अलग नजरियों के बीच थी, जिसने आखिरकार अजय देवगन की फिल्म को सिनेमा की बेहतरीन फिल्म साबित कर दिया.

नई दिल्ली. एक ही थीम, एक ही कहानी और एक ही दिन (7 जून 2002) पर दो मेगा बजट फिल्में रिलीज करना कमर्शियल सुसाइड से कम नहीं माना जाता, लेकिन भगत सिंह के प्रति श्रद्धा और उस दिन फिल्मों के बीच कॉम्पिटिशन ने इस रिस्क को सच कर दिया. एक तरफ राजकुमार संतोषी की ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ थी, जिसमें अजय देवगन लीड रोल में थे. दूसरी तरफ गुड्डू धनोआ की ’23 मार्च 1931: शहीद’ थी, जिसमें बॉबी देओल भगत सिंह और सनी देओल चंद्रशेखर आजाद के रोल में थे. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)

उस समय भगत सिंह की जिंदगी पर आधारित फिल्में बनाने का कॉम्पिटिशन था. कहा जाता है कि राजकुमार संतोषी और सनी देओल असल में एक ही फिल्म में साथ काम करने वाले थे, लेकिन आइडियोलॉजिकल मतभेदों के कारण, वे अलग हो गए और अपनी-अपनी फिल्में बनाने का फैसला किया. नतीजतन, दोनों फिल्मों की शूटिंग लगभग एक साथ हुई और दोनों ने एक ही तारीख पर रिलीज करने पर जोर दिया. यह सिचुएशन दर्शकों के लिए बहुत अजीब थी, क्योंकि दोनों फिल्मों के पोस्टर में भगत सिंह की एक जैसी पगड़ी और मूंछें थीं. ऑडियंस कन्फ्यूज थी कि किस फिल्म की कहानी ज्यादा असरदार होगी.

‘गदर’ की जबरदस्त कामयाबी के बाद, सनी देओल उस समय बॉलीवुड के सबसे बड़े एक्शन स्टार थे. उन्होंने अपने छोटे भाई बॉबी देओल के करियर को नई उड़ान देने के लिए इस फिल्म में अपनी पूरी मेहनत लगा दी. सनी का ‘चंद्रशेखर आजाद’ का रोल फिल्म के लिए एक बड़ा प्लस प्वाइंट माना गया. दूसरी ओर, अजय देवगन ने इस फिल्म के लिए खुद को पूरी तरह से बदल लिया. उन्होंने भगत सिंह के किरदार की गहराई को पकड़ा, उनकी आंखों की तेजी और उनके शांत लेकिन पक्के इरादे को स्क्रीन पर जिंदा कर दिया.
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अजय देवगन की फिल्म ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ के लिए की गई रिसर्च स्क्रीन पर साफ दिखाई दे रही थी. राजकुमार संतोषी ने फिल्म के डायलॉग और माहौल में जान डाल दी. इसके अलावा, एआर रहमान का म्यूजिक फिल्म की जान बन गया. ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ और ‘देस मेरे’ जैसे गानों ने ऑडियंस के दिलों को छू लिया, जिससे अजय देवगन की फिल्म के लिए एक अलग ही बज बन गया. दूसरी तरफ, देओल भाइयों की फिल्म थोड़ी ज्यादा ड्रामाटिक और अंडर-रिसर्च्ड लगी, जो क्रिटिक्स को इम्प्रेस नहीं कर पाई.

हालांकि उस दिन सिर्फ ये दोनों फिल्में ही नहीं, बल्कि एक तीसरी फिल्म ‘शहीद-ए-आजम’ भी रिलीज हुई थी, लेकिन मेन कॉम्पिटिशन अजय और देओल भाइयों के बीच ही रहा. कमर्शियली, दोनों फिल्मों ने ऑडियंस में बंटवारे के कारण एक-दूसरे के बिजनेस को नुकसान पहुंचाया, लेकिन ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ ने धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई.

यह फिल्म अजय देवगन के करियर में एक माइलस्टोन साबित हुई, जिससे उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला. इस फिल्म ने उस साल बेस्ट हिंदी फिल्म का नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी जीता. अजय देवगन ने साबित कर दिया कि जब एक्टिंग में गहराई और डायरेक्शन में क्लैरिटी हो, तो स्टार पावर और भाइयों की जोड़ी भी उसके सामने फीकी पड़ जाती है.

आज भी जब भगत सिंह की जिंदगी पर बनी फिल्मों की बात होती है, तो अजय देवगन की फिल्म को सबसे ऑथेंटिक और इम्पैक्टफुल माना जाता है. वह लड़ाई सिर्फ बॉक्स ऑफिस की नहीं थी, बल्कि बेहतरीन सिनेमा की जीत का सबूत थी.

