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बॉलीवुड के ‘जंपिंग जैक’ के नाम से मशहूर पुराने एक्टर जीतेंद्र ने 70 और 80 के दशक में बॉक्स ऑफिस पर सफलता का दौर देखा, जहां उनकी फिल्में रिलीज होते ही हिट मानी जाती थीं. हालांकि, 1990 के दशक तक हर बड़े सुपरस्टार की तरह जीतेंद्र का करियर चार्ट तेजी से नीचे गिर गया. 1993 से 2005 का समय जीतेंद्र के फिल्मी करियर का सबसे बुरा दौर साबित हुआ. इस 12 साल के समय में उन्होंने 12 बड़ी डिजास्टर और 8 फ्लॉप फिल्में दीं. सफलता की हर कोशिश बेकार साबित हुई, जिससे वह एक हिट के लिए तरस गए.

नई दिल्ली. एंटरटेनमेंट की दुनिया में सफलता और असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. बॉलीवुड में ऐसे दौर भी आए हैं जब बड़े-बड़े स्टार्स को भी बॉक्स ऑफिस पर स्ट्रगल करना पड़ा. सुपरस्टार जीतेंद्र, जिन्होंने 1970 और 1980 के दशक में साउथ इंडियन डायरेक्टर्स की फिल्मों के रीमेक बनाकर हिंदी बेल्ट पर राज किया, 1990 के दशक में भी उनका यही हाल हुआ. 1993 से 2005 तक, यानी 12 साल के समय में जीतेंद्र के स्टारडम ने एक ऐसा पहलू दिखाया जिसे कोई भी एक्टर याद नहीं रखना चाहेगा. बॉक्स ऑफिस इंडिया के अनुसार, इस दौरान जीतेंद्र ने जिन 21 फिल्मों में काम किया, उनमें से कोई भी, लीड एक्टर और सपोर्टिंग एक्टर के तौर पर ‘हिट’ या ‘सुपरहिट’ का स्टेटस हासिल नहीं कर पाई. इस आखिरी कमर्शियल पीरियड के दौरान, लगातार 12 फिल्में बुरी तरह फ्लॉप साबित हुईं, जबकि 8 फ्लॉप करार दी गईं. पूरे 12 सालों में सिर्फ एक फिल्म ही अपनी लागत वसूल कर पाई और ‘एवरेज’ का स्टेटस हासिल कर पाई.

1993 के आखिरी महीनों में जितेंद्र की फिल्में फ्लॉप होने लगीं. नवंबर 1993 में रिलीज हुई ‘संतान’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही, जिसने ₹2.19 करोड़ कमाए. ठीक एक महीने बाद, दिसंबर 1993 में आई ‘तहकीकत’ भी दर्शकों को इम्प्रेस नहीं कर पाई, जिसने ₹1.51 करोड़ कमाए. साल के आखिरी दिन, 31 दिसंबर 1993 को रिलीज हुई ‘आंसू बने अंगारे’ (₹1.63 करोड़) भी फ्लॉप रही. 1994 की किस्मत वैसी ही रही. अप्रैल 1994 में रिलीज हुई ‘चौराहा’ (₹1.54 करोड़) बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही. नवंबर 1994 में रिलीज हुई ‘उधार की जिंदगी’ जितेंद्र के करियर के लिए एक बड़ा झटका साबित हुई. फिल्म ने सिर्फ ₹1.05 करोड़ का नेट बिजनेस किया और इसे ऑफिशियली ‘डिजास्टर’ घोषित कर दिया गया. इसके बाद, दिसंबर 1994 में रिलीज हुई ‘घर की इज्जत’ भी फ्लॉप फिल्मों की लिस्ट में शामिल हो गई, जिसने सिर्फ ₹84.50 लाख कमाए.

साल 1995 जितेंद्र के लिए और भी बुरा सपना लेकर आया. मई 1995 में रिलीज हुई ‘जन्म कुंडली’ और जुलाई 1995 में रिलीज हुई ‘पापी देवता’ दोनों ही बैक-टू-बैक बड़ी डिजास्टर साबित हुईं. मेकर्स को उनकी बड़ी फिल्म ‘जमाना दीवाना’ से बहुत उम्मीदें थीं, जिसमें शाहरुख खान और रवीना टंडन स्टारर थे, जो उसी साल रिलीज हुई थी. लेकिन, 28 जुलाई 1995 को रिलीज हुई यह फिल्म एक बड़ी फ्लॉप साबित हुई, जिसने सिर्फ ₹4.67 करोड़ कमाए. साल का अंत अक्टूबर में रिलीज हुई ‘कलयुग के अवतार’ (41.75 लाख) की बड़ी डिजास्टर और ‘हम सब चोर हैं’ (1.67 करोड़) की फ्लॉप फिल्म के साथ हुआ. 1996 में जीतेंद्र ने सिर्फ एक बड़ी फिल्म ‘दुश्मन दुनिया का’ रिलीज की. सितंबर 1996 में रिलीज हुई इस फिल्म को दर्शकों ने पूरी तरह से रिजेक्ट कर दिया और यह एक और बड़ी डिजास्टर बन गई, जिसने सिर्फ 70.25 लाख कमाए.
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1997 जीतेंद्र के करियर का वह साल था, जब उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्मों में काम किया, लेकिन रिजल्ट वही रहे. फरवरी 1997 में रिलीज हुई ‘चुप’ एक बड़ी डिजास्टर थी, जिसने सिर्फ 29 लाख कमाए. मई 1997 में संजय दत्त और माधुरी दीक्षित जैसे बड़े स्टार्स की ‘महानता’ रिलीज हुई. इस बड़े बजट की फिल्म से जीतेंद्र की किस्मत बदलने की उम्मीद थी, लेकिन यह भी सिर्फ ₹5.25 करोड़ पर फ्लॉप हो गई. जुलाई 1997 में पौराणिक फिल्म ‘लव कुश’ रिलीज हुई, जिसने सिर्फ ₹43.25 लाख कमाए, जो बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह से फ्लॉप रही.

कई नाकामियों के बीच, 12 सितंबर 1997 को रिलीज हुई ‘जज मुजरिम’ इस 12 साल के समय में जीतेंद्र के लिए एकमात्र राहत बनी. फिल्म ने थिएटर में संघर्ष किया और ₹3.57 करोड़ की कमाई की, जिससे इसे ट्रेड से ‘औसत’ रेटिंग मिली. लेकिन, यह राहत ज्यादा दिन नहीं रही, क्योंकि अक्टूबर 1997 में इसकी तुरंत रिलीज हुई फिल्में ‘धर्म कर्मा’ और ‘कृष्णा अर्जुन’ दोनों ही बड़ी डिजास्टर साबित हुईं. 1990 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत में जितेंद्र ने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया, लेकिन जो फिल्में रिलीज हुईं, उनका हाल पहले से भी ज्यादा बुरा हुआ.

अक्टूबर 1999 में रिलीज हुई, मल्टी-स्टारर फिल्म ‘मदर’ बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह से फेल हो गई, जो एक बड़ी डिजास्टर थी. दो साल बाद, मई 2001 में ‘जयदेव’ का हाल और भी बुरा हुआ. फिल्म को थिएटर में दर्शक नहीं मिले और यह एक डिजास्टर बन गई.

‘हो जाता है प्यार’ दिसंबर 2005 में रिलीज हुई, जिससे जितेंद्र के लिए यह निराशाजनक समय खत्म हुआ और उनके फिल्मी करियर की आखिरी कमर्शियल रिलीज हुई. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस के इतिहास में जितेंद्र की सबसे कम कमाई करने वाली फिल्म बन गई, जिसने देश भर में सिर्फ ₹4.75 लाख कमाए. इस बड़ी असफलता ने जितेंद्र के 12 साल के सफर का अंत कर दिया, जिसमें लगातार 20 कमर्शियल फिल्में नाकामयाब रहीं.

