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बॉलीवुड के इतिहास में ऐसे कई किस्से दर्ज हैं जहां दो बड़े सुपरस्टार्स के बीच स्क्रीन स्पेस, डायलॉग्स और स्टारडम को लेकर खींचतान हुई है. 70 और 80 का दौर तो ऐसी कल्ट राइवलरी और दिलचस्प कहानियों से भरा पड़ा है. एक ऐसा ही बेहद हैरान करने वाला और अनसुना वाक्या साल 1982 में सामने आया था. जब अमिताभ बच्चन और राजकुमार की जोड़ी बनते-बनते रह गई थी.

नई दिल्ली. बॉलीवुड के इतिहास में कई ऐसी फिल्में रही हैं, जिनकी कहानी से ज्यादा उनकी कास्टिंग के किस्से चर्चा में रहे. साल 1982 में रिलीज हुई ‘देश प्रेमी’ भी ऐसी ही फिल्मों में गिनी जाती है. देशभक्ति, एक्शन और इमोशनल ड्रामे से भरी इस फिल्म को मनमोहन देसाई बड़े स्तर पर बनाना चाहते थे. उनकी इच्छा थी कि फिल्म में हिंदी सिनेमा के दो दमदार सितारे अमिताभ बच्चन और राजकुमार पहली बार साथ लाने की थी. साथ में काम शुरु भी हुआ, लेकिन एक डर, कुछ गलतफहमियां और स्क्रीन स्पेस को लेकर उठी चिंता ने यह सपना अधूरा छोड़ दिया.

हिंदी सिनेमा के जाने-माने ब्लॉकबस्टर डायरेक्टर मनमोहन देसाई एक महा-फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे. वह अपनी इस फिल्म में उस दौर के सबसे कड़क और बेबाक अभिनेता राजकुमार और उभरते हुए ‘एंग्री यंग मैन’ अमिताभ बच्चन को एक साथ स्क्रीन पर लाना चाहते थे. फिल्म का नाम था ‘देश प्रेमी’. लेकिन मनमोहन देसाई का यह सबसे बड़ा सपना बॉलीवुड के एक ‘ईगो क्लैश’ और असुरक्षा की भेंट चढ़ गया.

ये वो समय था, जब अमिताभ बच्चम तेजी से सुपरस्टार बन रहे थे. उनकी फिल्मों का दौर शुरू हो चुका था और दर्शकों के बीच उनका क्रेज बढ़ता जा रहा था. दूसरी तरफ राजकुमार पहले से ही इंडस्ट्री के बड़े नाम थे. उनकी दमदार आवाज, डायलॉग्स बोलने का अलग अंदाज और स्क्रीन प्रेजेंस उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती थी. ऐसे में जब मनमोहन देसाई ने दोनों को एक साथ लाने का फैसला किया तो इंडस्ट्री में भी इस खबर ने हलचल मचा दी थी.
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लेकिन, राजकुमार को इस बात का डर सताने लगा था कि अमिताभ बच्चन न सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री में एक नई और फ्रेश एनर्जी लेकर आए हैं, बल्कि वह डायरेक्टर मनमोहन देसाई के बेहद अजीज दोस्त भी हैं. राजकुमार को लगा कि डायरेक्टर और अमिताभ की इस नजदीकी और गहरी दोस्ती का असर फिल्म पर पड़ सकता है, जिससे उनके खुद के रोल के साथ नाइंसाफी हो सकती है. उन्हें डर था कि कहीं अमिताभ को ज्यादा फुटेज न मिल जाए और उनका अपना किरदार फीका पड़ जाए.

दिलचस्प बात यह थी कि डायरेक्टर मनमोहन देसाई के दिमाग में ऐसा कोई भेदभाव नहीं था. वह दोनों ही कलाकारों को बराबर का स्क्रीन स्पेस और तवज्जो देना चाहते थे, ताकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच सके. लेकिन जब राजकुमार ने अपनी इस असुरक्षा और मन की बात मनमोहन देसाई के साथ खुलकर शेयर की तो डायरेक्टर धर्मसंकट में पड़ गए. राजकुमार को फिल्म में बनाए रखने के लिए मनमोहन देसाई उनकी शर्त मानने को तैयार हो गए.

राजकुमार को शांत करने के लिए डायरेक्टर ने उनके रोल को ज्यों का त्यों रहने दिया, लेकिन संतुलन बनाने के लिए उन्होंने अमिताभ बच्चन के रोल में कुछ कटौतियां (कांट-छांट) कर दीं. अब चुनौती यह थी कि अमिताभ बच्चन को इस बात के लिए कैसे राजी किया जाए और उन्हें बुरा न लगे. इसके लिए मनमोहन देसाई ने एक नायाब रास्ता निकाला. उन्होंने अमिताभ बच्चन के रोल को काटने के एवज में उन्हें राजकुमार से भी ज्यादा फीस ऑफर कर दी. भारी-भरकम पैसा और डायरेक्टर की मजबूरी को देखते हुए अमिताभ बच्चन भी इस बात के लिए मान गए और वह खुश थे.

मामला सुलझ गया था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. फिल्म की शूटिंग शुरू होने के कुछ समय बाद ही राजकुमार को इस पूरी बैकस्टेज प्लानिंग की भनक लग गई. उन्हें पता चल गया कि अमिताभ बच्चन का रोल छोटा करने के लिए डायरेक्टर ने उन्हें उनसे भी ज्यादा पैसे दिए हैं. यह बात राजकुमार के आत्मसम्मान पर लग गई. वह इस बात से डायरेक्टर पर बुरी तरह नाराज और आगबबूला हो गए. राजकुमार का मानना था कि फिल्म और काम को लेकर कोई समझौता नहीं होना चाहिए. राजकुमार ने मनमोहन देसाई से इस बात पर ठन गए.

उनका गुस्सा इस हद तक बढ़ गया कि उन्होंने फिल्म से बाहर निकलने का फैसला सुना दिया. मनमोहन देसाई ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, मगर राजकुमार अपने फैसले पर अड़े रहे. उनके लिए पैसे से ज्यादा रेपुटेशन मायने रखता था. राजकुमार के अचानक फिल्म छोड़ने से मनमोहन देसाई को बड़ा झटका लगा. इसके बाद उनके पास एक ही विकल्प था किसी और बड़े अभिनेता को इस भूमिका के लिए लेना.

आनन-फानन में राजकुमार वाले अहम किरदार के लिए दूसरे एक्टर्स की तलाश शुरू हुई. काफी सोच-विचार के बाद, मनमोहन देसाई ने बॉलीवुड के ‘एल्विस प्रेस्ली’ कहे जाने वाले दिग्गज अभिनेता शम्मी कपूर को इस रोल के लिए साइन किया. साल 1982 में जब ‘देश प्रेमी’ रिलीज हुई, तो फिल्म में अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, शम्मी कपूर, परवीन बाबी और अमजद खान जैसे बड़े सितारों की फौज मौजूद थी.

हालांकि, मनमोहन देसाई ने फिल्म को बड़े पैमाने पर बनाया था, लेकिन राजकुमार के जाने और स्क्रिप्ट में किए गए बदलावों का असर फिल्म पर साफ दिखा. कमजोर कहानी और स्क्रीनप्ले के कारण यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर वो करिश्मा नहीं दोहरा सकी जिसकी उम्मीद की जा रही थी और यह फिल्म फ्लॉप साबित हुई. आज भी जब बॉलीवुड की अधूरी कास्टिंग या मिस्ड ऑपर्च्युनिटी की बात होती है, तो देश प्रेमी का नाम जरूर लिया जाता है. क्योंकि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि हिंदी सिनेमा के दो सबसे दमदार कलाकारों को एक साथ देखने का सपना भी थी, जो कभी पूरा नहीं हो सका.

