Last Updated:
आज की पीढ़ी जब भी सस्पेंस, मिस्ट्री और धोखे वाली फिल्मों के बारे में सोचती है, तो सबसे पहले अजय देवगन की ‘दृश्यम’ सीरीज का नाम दिमाग में आता है. लेकिन, अगर हम बॉलीवुड के इतिहास को देखें, तो सस्पेंस और क्राइम थ्रिलर जॉनर के असली किंग एवरग्रीन एक्टर देवानंद थे. 1950 और 1960 के दशक में जब पूरी फिल्म इंडस्ट्री सिर्फ कन्वेंशनल रोमांस और फैमिली ड्रामा के आस-पास घूमती थी, देवानंद ने अपने यूनिक स्टाइल और विजन से दर्शकों को ‘नॉयर सिनेमा’ के थ्रिल से इंट्रोड्यूस कराया. ये 6 फिल्में, जिनमें से हर एक में माइंड-ब्लोइंग क्लाइमैक्स हैं, इसका पक्का सबूत हैं.

नई दिल्ली. आजकल जब कोई सस्पेंस या थ्रिलर फिल्म बड़े पर्दे पर आती है, तो अक्सर टेक्नोलॉजी, वीएफएक्स और मॉडर्न बैकग्राउंड स्कोर का इस्तेमाल किया जाता है. मेकर्स दर्शकों को चौंकाने के लिए बड़े स्क्रीनप्ले बनाते हैं. लेकिन जरा सोचिए, लगभग 70 साल पहले, बिना किसी मॉडर्न टेक्नोलॉजी के सिर्फ जादुई एक्टिंग, शार्प डायलॉग डिलीवरी और शानदार डायरेक्शन से दर्शकों को हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देना कितना बड़ा हुनर रहा होगा. देवानंद के पास यही हुनर था. लोग आमतौर पर देवानंद को उनके रोमांटिक स्टाइल, टेढ़ी टोपी वाले स्टाइल और तेज-तर्रार बात करने के तरीके के लिए याद करते हैं. लेकिन फिल्म क्रिटिक्स के मुताबिक, देव साहेब हिंदी सिनेमा के पहले ‘क्राइम और मिस्ट्री स्टार’ थे. अपने बैनर, नवकेतन फिल्म्स के तहत उन्होंने ऐसी डार्क कहानियों में कदम रखा, जिन्हें उस जमाने के दूसरे डायरेक्टर छूने से भी हिचकिचाते थे. तो आइए, देवानंद की उन 6 लैंडमार्क फिल्मों को डिटेल में जानते हैं.

1. बाजी (रिलीज: 1951)- मशहूर डायरेक्टर गुरु दत्त की डायरेक्ट की हुई ‘बाजी’ को इंडियन सिनेमा की पहली ‘नोयर’ (डार्क-अर्बन क्राइम) फिल्म माना जाता है. इस फिल्म में देवानंद ने मदन नाम के एक जुआरी का रोल किया था, जो अपनी बीमार बहन के इलाज के लिए पैसे की तलाश में अंडरवर्ल्ड की अंधेरी गलियों में खो जाता है. फिल्म की कहानी ने मर्डर का एक ऐसा रहस्यमयी जाल बुना जिसने दर्शकों को आखिर तक अपनी सीट से बांधे रखा. कोर्टरूम ड्रामा और लगातार बदलते गवाहों ने इस फिल्म को एक कल्ट क्लासिक बना दिया.

2. जाल (रिलीज: 1952)- ‘बाज’ की जबरदस्त सफलता के बाद, देवानंद और गुरु दत्त की जोड़ी ने अपने सिनेमाई एक्सपेरिमेंट को एक कदम और आगे बढ़ाया. गोवा के खूबसूरत और रहस्यमयी समुद्रों के बैकग्राउंड में बनी ‘जाल’ ने उस समय काफी अटेंशन बटोरा था. इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि देवानंद ने इसमें कोई आम हीरो नहीं, बल्कि ‘टोनी’ नाम के एक चालाक, धोखेबाज और स्मगलर का रोल किया था. वह अपनी मीठी-मीठी बातों से लड़कियों को फंसाता था. देव साहब का यह ग्रे-शेडेड अवतार दर्शकों के लिए बिल्कुल नया और चौंकाने वाला था.
Add News18 as
Preferred Source on Google

3. हाउस नंबर 44 (रिलीज: 1955)- यह फिल्म जासूसी और क्राइम की दुनिया का एक अनोखा उदाहरण है, जिसके बारे में आज की पीढ़ी बहुत कम जानती है. एमके धीरेंद्र के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म की कहानी एक ऐसे घर (हाउस नंबर 44) के इर्द-गिर्द घूमती है जो कई अनसुलझे मर्डर से जुड़ा है. देवानंद ने एक ऐसे मासूम नौजवान का रोल किया था जो अनजाने में एक बहुत खतरनाक क्रिमिनल गैंग का मोहरा बन जाता है. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक और सिनेमैटोग्राफी इतनी डार्क थी कि इसने थिएटर में बैठे दर्शकों को डरा दिया.

4. CID (रिलीज: 1956)- डायरेक्टर राज खोसला की फिल्म ‘CID’ आज भी इंडियन सिनेमा की सबसे बेहतरीन कॉप-थ्रिलर में से एक मानी जाती है. कहानी एक न्यूजपेपर एडिटर के मर्डर से शुरू होती है, जिसकी इन्वेस्टिगेशन का काम बहादुर इंस्पेक्टर शेखर (देवानंद) को सौंपा जाता है. कहानी का असली थ्रिलर तब सामने आता है जब एक-एक करके जरूरी गवाहों का मर्डर हो जाता है और इंस्पेक्टर शेखर को ही कातिल बताकर जेल में डाल दिया जाता है. असली विलेन का पता आखिरी कुछ मिनटों में एक जबरदस्त ट्विस्ट के साथ चलता है.

5. काला बाजार (रिलीज: 1960)- अपने भाई विजय आनंद (गोल्डी) के डायरेक्शन में बनी, देव साहेब ने ‘काला बाजार’ जैसी फिल्म दी, जिसने उस समय की ब्लैक मार्केटिंग के काले धंधे का पर्दाफाश किया. फिल्म में देवानंद ने रघु नाम के एक नौजवान का रोल किया, जो सिनेमा हॉल के बाहर टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग करके अपना सफर शुरू करता है और धीरे-धीरे एक बड़े क्रिमिनल एम्पायर का बेताज बादशाह बन जाता है. इस क्राइम ड्रामा में भरे थ्रिल और रोमांस ने इसे बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ी सक्सेस दी.

6. ज्वेल थीफ (रिलीज: 1967)- अगर हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे शानदार, सस्पेंस से भरी और दिमाग घुमा देने वाली फिल्म का नाम लेना हो, तो ‘ज्वेल थीफ’ पहले नंबर पर आएगी. विजय आनंद के शानदार डायरेक्शन ने इस फिल्म को एक अमर मास्टरपीस बना दिया. कहानी एक चालाक चोर के इर्द-गिर्द घूमती है जिसका चेहरा देवानंद (विनय) से काफी मिलता-जुलता है. हर कोई विनय को असली चोर समझ लेता है, और विनय अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए निकल पड़ता है.

